भू-आकृति विज्ञान: एक परिचय
भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) पृथ्वी विज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी की सतह के विभिन्न रूपों, उनकी उत्पत्ति, विकास और विन्यास का अध्ययन करती है। यह विज्ञान हमें पृथ्वी की सतह पर विभिन्न भू-आकृतियों जैसे पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ, मरुस्थल आदि के निर्माण के कारकों एवं प्रक्रियाओं को समझने में सहायता करता है।
UPSC परिप्रेक्ष्य में महत्व
भारतीय भूगोल और विश्व भूगोल के अंतर्गत भू-आकृति विज्ञान एक महत्वपूर्ण विषय है। यह प्रीलिम्स और मेन्स दोनों परीक्षाओं के लिए आवश्यक है। भूकंप, ज्वालामुखी, अपरदन, निक्षेपण जैसी प्रक्रियाओं की समझ पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन से संबंधित प्रश्नों के लिए भी उपयोगी है।
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ
भू-आकृतियों के निर्माण हेतु दो प्रमुख प्रक्रियाएँ उत्तरदायी हैं:
अंतर्जात प्रक्रियाएँ (Endogenic Processes)
ये प्रक्रियाएँ पृथ्वी के आंतरिक भाग में होने वाली गतिविधियों से संबंधित हैं। इनमें शामिल हैं:
- विवर्तनिकी (Tectonics): भूपटल के खंडों की गतियाँ
- ज्वालामुखी (Volcanism): मैग्मा का सतह पर प्रकट होना
- भूकंप (Earthquakes): भूपटल का कंपन
- पर्वत निर्माण (Orogeny): पर्वत श्रृंखलाओं का निर्माण
बहिर्जात प्रक्रियाएँ (Exogenic Processes)
ये प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह पर कार्य करती हैं और मुख्यतः अपक्षय, अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण से संबंधित हैं:
चट्टानों का भौतिक या रासायनिक विघटन
चट्टानी पदार्थों का हटाया जाना
अपरदित पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जाना
परिवहित पदार्थों का जमाव
भारत की प्रमुख भू-आकृतियाँ
भारत को निम्नलिखित प्रमुख भौतिक विभागों में बाँटा जा सकता है:
हिमालय पर्वत श्रृंखला
युवा वलित पर्वत, टेथिस सागर के अवसादों से निर्मित
उत्तरी मैदान
सिंधु, गंगा व ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा निर्मित जलोढ़ मैदान
प्रायद्वीपीय पठार
प्राचीन गोंडवाना लैंड का अवशेष, ग्रेनाइट व गनीस चट्टानें
तटीय मैदान
पश्चिम में संकीर्ण व पूर्व में चौड़ा, डेल्टाई भूमि
भारत में भू-आकृतियों का वितरण
- हिमालय: उत्तर में चापाकार पर्वत श्रृंखला
- प्रायद्वीपीय पठार: प्राचीन आग्नेय व कायांतरित चट्टानों से निर्मित
- थार का मरुस्थल: शुष्क क्षेत्र, बालुका स्तूपों की अधिकता
- पूर्वी तटीय मैदान: चौड़ा, नदियों द्वारा निर्मित डेल्टा
- पश्चिमी तटीय मैदान: संकरा, लैगूनों की अधिकता
भू-आकृति विज्ञान के महत्वपूर्ण सिद्धांत
संरचना, प्रक्रिया और समय का सिद्धांत
विलियम मॉरिस डेविस द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत भू-आकृतियों के विकास को तीन कारकों - संरचना (चट्टानों की प्रकृति), प्रक्रिया (अपरदनकारी शक्तियाँ) और समय (विकास की अवधि) के आधार पर समझाता है।
पेनिप्लेन सिद्धांत
यह सिद्धांत बताता है कि अपरदन की प्रक्रियाएँ भू-पृष्ठ को समतल करने की प्रवृत्ति रखती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पेनिप्लेन (लगभग समतल भूमि) का निर्माण होता है।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत
यह आधुनिक सिद्धांत पृथ्वी की सतह को कई प्लेटों में विभाजित मानता है जो मैंटल के संवहन धाराओं के कारण गतिशील हैं। इसी से पर्वतों, महासागरीय गर्तों और ज्वालामुखियों का निर्माण होता है।