दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंशों - चोल, चालुक्य, पल्लव और संगम युग का अध्ययन UPSC, SSC, रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह नोट्स परीक्षा की दृष्टि से संपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।
संगम युग दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्यिक युग है। संगम का अर्थ है 'सभा' या 'सम्मेलन'। यह तमिल कवियों, विद्वानों और विचारकों की सभा थी जो मदुरै में आयोजित होती थी।
पल्लव वंश ने कांचीपुरम (वर्तमान तमिलनाडु) से शासन किया। यह वंश दक्षिण भारत के सांस्कृतिक विकास में अग्रणी रहा।
| शासक | शासनकाल | उपलब्धियाँ |
|---|---|---|
| सिंहविष्णु | 575-600 ईस्वी | चालुक्यों पर विजय, वैष्णव धर्म का संरक्षण |
| महेंद्रवर्मन प्रथम | 600-630 ईस्वी | वास्तुकला का विकास, मामंदुर के गुफा मंदिर |
| नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) | 630-668 ईस्वी | वातापी विजय, महाबलीपुरम का निर्माण |
पल्लवों ने द्रविड़ वास्तुकला की नींव रखी। महाबलीपुरम में रथ मंदिर और तट मंदिर उनकी कलात्मक उत्कृष्टता के उदाहरण हैं। कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर भी पल्लवों की देन है।
चालुक्यों ने बादामी (वर्तमान कर्नाटक) से शासन किया। उनका साम्राज्य तीन शाखाओं में विभाजित था: बादामी चालुक्य, पूर्वी चालुक्य और पश्चिमी चालुक्य।
चालुक्यों ने वेसरा शैली (उत्तर और दक्षिण शैली का मिश्रण) में मंदिरों का निर्माण किया। पट्टाडकल और ऐहोल के मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं।
चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली और दीर्घकालीन साम्राज्य था। इसकी राजधानी तंजावुर (थानजावुर) थी।
| शासक | शासनकाल | उपलब्धियाँ |
|---|---|---|
| विजयालय | 850-871 ईस्वी | तंजावुर पर अधिकार, चोल साम्राज्य की स्थापना |
| आदित्य प्रथम | 871-907 ईस्वी | पल्लवों की पराजय, कावेरी घाटी पर नियंत्रण |
| राजराजा प्रथम | 985-1014 ईस्वी | तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण, नौसैनिक विस्तार |
| राजेंद्र प्रथम | 1014-1044 ईस्वी | गंगईकोंड चोलपुरम की स्थापना, श्रीलंका व दक्षिण-पूर्व एशिया पर विजय |
चोलों का प्रशासन अत्यंत विकसित और व्यवस्थित था। ग्राम सभाएँ (उर और सभा) स्थानीय स्वशासन की इकाई थीं। भूमि कर, व्यापार कर और सिंचाई कर राजस्व के मुख्य स्रोत थे।
चोल काल द्रविड़ वास्तुकला का स्वर्ण युग माना जाता है। तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, गंगईकोंड चोलपुरम मंदिर और ऐरावतेश्वर मंदिर इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। चोल कांस्य मूर्तियाँ विश्वप्रसिद्ध हैं, विशेषकर नटराज की मूर्तियाँ।
उत्तर: (b) तमिल
व्याख्या: संगम साहित्य प्राचीन तमिल भाषा में रचा गया था। यह दक्षिण भारत के प्रारंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है। संगम साहित्य में प्रेम, युद्ध, शासन और सामाजिक जीवन का वर्णन मिलता है।
उत्तर: (c) पल्लव
व्याख्या: महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) में स्थित रथ मंदिरों का निर्माण पल्लव वंश के शासकों ने करवाया था, विशेषकर नरसिंहवर्मन प्रथम के काल में। ये मंदिर एकल चट्टान को काटकर बनाए गए हैं और द्रविड़ वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
उत्तर: (c) तंजावुर
व्याख्या: चोल साम्राज्य की राजधानी तंजावुर (वर्तमान तमिलनाडु में) थी। राजराजा चोल ने यहाँ प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था। तंजावुर चोलों की राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र था।
उत्तर: (b) नरसिंहवर्मन प्रथम
व्याख्या: पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर उनकी राजधानी वातापी (बादामी) पर अधिकार कर लिया था। इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने 'वातापीकोंड' (वातापी का विजेता) की उपाधि धारण की।
उत्तर: (c) रविकीर्ति
व्याख्या: ऐहोल प्रशस्ति की रचना चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति ने की थी। यह संस्कृत में लिखी गई है और इसमें पुलकेशिन द्वितीय की विजयों, विशेषकर हर्षवर्धन पर विजय का विस्तृत वर्णन है।
उत्तर: (c) शिव
व्याख्या: चोल काल की नटराज की कांस्य मूर्तियाँ विश्वप्रसिद्ध हैं। यह भगवान शिव के तांडव नृत्य का चित्रण है, जो सृजन, संरक्षण और विनाश के चक्र का प्रतीक है। यह चोल कला की उत्कृष्टता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
उत्तर: (d) शिलप्पादिकारम
व्याख्या: इलांगो आदिगल द्वारा रचित 'शिलप्पादिकारम' को इसकी कथावस्तु, पात्र चित्रण और काव्यात्मक उत्कृष्टता के कारण 'तमिल साहित्य का इलियड' कहा जाता है। इसमें कोवलन और कन्नगी की दुखद कहानी का वर्णन है।
उत्तर: (c) चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिर
व्याख्या: पल्लव शासक महेंद्रवर्मन प्रथम द्वारा शुरू की गई 'महेंद्र शैली' की विशेषता चट्टानों को काटकर बनाए गए स्तंभयुक्त गुफा मंदिर (मंडप) थे। ये मंदिर बिना किसी ईंट, लकड़ी या धातु के उपयोग के बनाए गए थे।
उत्तर: (b) राजेंद्र प्रथम
व्याख्या: राजेंद्र प्रथम ने उत्तर भारत में गंगा नदी तक सफल सैन्य अभियान किया था। इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने 'गंगईकोंड चोल' (गंगा का विजेता चोल) की उपाधि धारण की और कावेरी के तट पर 'गंगईकोंड चोलपुरम' नामक एक नई राजधानी का निर्माण किया।
उत्तर: (b) नागर और द्रविड़ शैली
व्याख्या: वेसरा शैली, जिसे चालुक्य शैली भी कहा जाता है, उत्तर भारत की नागर शैली और दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली का एक संकर रूप है। इस शैली के मंदिर ऐहोल, बादामी और पट्टाडकल में देखे जा सकते हैं।
उत्तर: (c) तमिल व्याकरण और काव्यशास्त्र
व्याख्या: 'तोल्काप्पियम' द्वितीय संगम का एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ है और इसकी रचना तोल्काप्पियर ने की थी। यह तमिल भाषा के व्याकरण, काव्यशास्त्र और सामाजिक रीति-रिवाजों पर एक विस्तृत ग्रंथ है।
उत्तर: (c) नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह)
व्याख्या: कांचीपुरम में स्थित कैलाशनाथ मंदिर, जो द्रविड़ वास्तुकला का एक प्रारंभिक और शानदार उदाहरण है, का निर्माण पल्लव शासक नरसिंहवर्मन द्वितीय (जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है) ने करवाया था। यह एक संरचनात्मक मंदिर है।
उत्तर: (b) ग्राम सभा के सदस्यों के चुनाव की एक प्रणाली
व्याख्या: कुडवोलाई प्रणाली चोल प्रशासन की एक अनूठी विशेषता थी। इसमें ग्राम सभा (सभा) के सदस्यों का चुनाव लॉटरी द्वारा किया जाता था। योग्य उम्मीदवारों के नाम ताड़ के पत्तों पर लिखे जाते थे और एक बर्तन में डाल दिए जाते थे, फिर एक बच्चे द्वारा एक पत्ता निकाला जाता था।
उत्तर: (b) ह्वेनसांग (ह्वेन त्सांग)
व्याख्या: प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में भारत की यात्रा की थी। उन्होंने चालुक्य साम्राज्य का भी दौरा किया और अपने यात्रा वृत्तांत में पुलकेशिन द्वितीय के शासन और शक्ति की प्रशंसा की है।
उत्तर: (c) बृहदीश्वर मंदिर, तंजावुर
व्याख्या: राजराजा प्रथम द्वारा निर्मित तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, जिसे राजराजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है, अपने विशाल विमान (गर्भगृह के ऊपर का टॉवर) के कारण 'दक्षिण मेरु' (दक्षिण का मेरु पर्वत) के रूप में जाना जाता है। यह पूरी तरह से ग्रेनाइट से बना है।
उत्तर: (a) युद्ध के देवता
व्याख्या: संगम काल में मुरुगन सबसे महत्वपूर्ण देवता थे, जिन्हें युद्ध और विजय का देवता माना जाता था। बाद में उन्हें उत्तर भारत के कार्तिकेय (स्कंद) के साथ जोड़ दिया गया।
उत्तर: (c) मत्तविलास प्रहसन
व्याख्या: 'मत्तविलास प्रहसन' एक संस्कृत व्यंग्य नाटक है जिसकी रचना पल्लव राजा महेंद्रवर्मन प्रथम ने की थी। यह नाटक कापालिक और पाशुपत शैव संप्रदायों के अनुयायियों और बौद्ध भिक्षुओं पर व्यंग्य करता है।
उत्तर: (c) एक प्रांत (मंडलम) का उप-विभाजन
व्याख्या: चोल प्रशासन में, साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित किया गया था जिन्हें 'मंडलम' कहा जाता था। प्रत्येक मंडलम को 'वलनाडु' या 'कोट्टम' नामक इकाइयों में विभाजित किया गया था, जो आधुनिक जिलों के समान थे।
उत्तर: (d) चालुक्य
व्याख्या: पट्टाडकल, जो अब कर्नाटक में है, बादामी के चालुक्यों की राजधानी थी। यहाँ के मंदिर नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों का एक सामंजस्यपूर्ण मिश्रण प्रस्तुत करते हैं और चालुक्य वास्तुकला की परिपक्वता को दर्शाते हैं।
उत्तर: (b) राजेंद्र प्रथम
व्याख्या: जबकि राजराजा प्रथम ने उत्तरी श्रीलंका पर विजय प्राप्त की थी, उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने पूरे द्वीप पर विजय प्राप्त की और इसे 'मुम्मिडिचोलमंडलम' नाम से चोल साम्राज्य का एक प्रांत बना लिया।
उत्तर: (c) सभा
व्याख्या: चोल प्रशासन में सभा (या महासभा) ब्राह्मणों के गाँवों (ब्रह्मदेय) में स्थानीय स्वशासन की महत्वपूर्ण इकाई थी। 'उर' सामान्य गाँवों की सभा थी। सभा के सदस्य लॉटरी (कुडवोलाई) प्रणाली द्वारा चुने जाते थे।
उत्तर: (b) बौद्ध धर्म
व्याख्या: सीतलै सत्तनार द्वारा रचित 'मणिमेकलै' शिलप्पादिकारम की कहानी को आगे बढ़ाती है। इसकी नायिका मणिमेकलै अंततः बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। यह महाकाव्य बौद्ध दर्शन और सिद्धांतों का प्रचार करता है।
उत्तर: (c) कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब पर नियंत्रण
व्याख्या: चालुक्य और पल्लवों के बीच लंबे समय तक चले संघर्ष का मुख्य कारण कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच के उपजाऊ दोआब क्षेत्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करना था। यह क्षेत्र कृषि और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
उत्तर: (b) शासक वर्ग
व्याख्या: संगम समाज में, 'अरसर' शासक वर्ग को संदर्भित करता था। 'अन्थनार' पुजारी वर्ग थे, 'वणिकार' व्यापारी थे और 'वेल्लालर' धनी किसान थे।
उत्तर: (a) महाबलीपुरम का तट मंदिर (शोर टेम्पल)
व्याख्या: राजसिंह (नरसिंहवर्मन द्वितीय) द्वारा विकसित शैली में संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ। महाबलीपुरम का प्रसिद्ध तट मंदिर (शोर टेम्पल) इस शैली का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है।
उत्तर: (c) राजराजा प्रथम
व्याख्या: राजराजा प्रथम ने एक विशाल और शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया। इस नौसेना के बल पर उन्होंने श्रीलंका, मालदीव और मलय प्रायद्वीप के कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और बंगाल की खाड़ी को 'चोलों की झील' में बदल दिया।
उत्तर: (c) कीर्तिवर्मन द्वितीय
व्याख्या: बादामी के चालुक्य वंश का अंतिम शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय था। उसे 753 ईस्वी में राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक दन्तिदुर्ग ने पराजित कर राष्ट्रकूट साम्राज्य की नींव रखी।
उत्तर: (b) पहाड़ी और जंगली क्षेत्र
व्याख्या: संगम साहित्य में तमिलकम को पाँच तिणै (भौगोलिक क्षेत्रों) में विभाजित किया गया है। 'कुरिंजी' पहाड़ी क्षेत्र था, जहाँ के लोग शिकार और शहद इकट्ठा करने का काम करते थे।
उत्तर: (b) सैन्य छावनी या गैरीसन
व्याख्या: चोल प्रशासन में 'कडगम' शब्द का प्रयोग सैन्य छावनियों या गैरीसन के लिए किया जाता था, जहाँ सैनिक रहते थे और प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। ये साम्राज्य की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण थे।
उत्तर: (c) सेक्किझार
व्याख्या: 'पेरियपुराणम' की रचना 12वीं शताब्दी में चोल शासक कुलोत्तुंग द्वितीय के शासनकाल में सेक्किझार ने की थी। यह तमिल शैव भक्ति साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति है और इसमें 63 नयनार संतों के जीवन का वर्णन है।