मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद के काल को मौर्योत्तर काल कहा जाता है। यह काल लगभग 200 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी तक माना जाता है। इस काल में भारत में कई नए राजवंशों का उदय हुआ, जिनमें शुंग, कण्व, सातवाहन, कुषाण और इंडो-ग्रीक प्रमुख हैं।
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में राजनीतिक एकता समाप्त हो गई। इस अवधि में उत्तर भारत में शुंग और कण्व वंशों ने शासन किया, जबकि दक्षिण में सातवाहन वंश सत्ता में आया। उत्तर-पश्चिम में यूनानी, शक, पह्लव और कुषाणों ने शासन किया। यह काल धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
| राजवंश | शासन काल | प्रमुख शासक | शासन क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| शुंग वंश | 185-73 ईसा पूर्व | पुष्यमित्र शुंग | मध्य भारत |
| कण्व वंश | 73-28 ईसा पूर्व | वासुदेव कण्व | मगध |
| सातवाहन वंश | 60 ईसा पूर्व - 225 ईस्वी | गौतमीपुत्र शातकर्णी | दक्कन (दक्षिण भारत) |
| इंडो-ग्रीक | 180 ईसा पूर्व - 10 ईस्वी | मेनांडर (मिलिंद) | उत्तर-पश्चिम भारत |
| कुषाण वंश | 30-375 ईस्वी | कनिष्क | उत्तर भारत |
शुंग वंश (185-73 ईसा पूर्व): मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की। इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक पुष्यमित्र शुंग था, जिसने दो अश्वमेध यज्ञ किए। शुंगों ने मध्य भारत पर शासन किया।
कण्व वंश (73-28 ईसा पूर्व): शुंग वंश के अंतिम शासक देवभूमि की हत्या कर वासुदेव कण्व ने कण्व वंश की स्थापना की। यह वंश लगभग 45 वर्षों तक शासन करता रहा।
सातवाहन वंश (60 ईसा पूर्व - 225 ईस्वी): इस वंश की स्थापना सिमुक ने की थी। सातवाहनों ने दक्कन (दक्षिण भारत) में शासन किया। गौतमीपुत्र शातकर्णी इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था, जिसने शकों को पराजित किया था।
इंडो-ग्रीक (180 ईसा पूर्व - 10 ईस्वी): यूनानी शासकों ने उत्तर-पश्चिम भारत पर शासन किया। मेनांडर (मिलिंद) सबसे प्रसिद्ध इंडो-ग्रीक शासक था, जिसने बौद्ध धर्म अपनाया। 'मिलिंदपन्हो' नामक बौद्ध ग्रंथ में राजा मेनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच संवाद है।
कुषाण वंश (30-375 ईस्वी): कुषाण मूल रूप से मध्य एशिया के निवासी थे। कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था, जिसने चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया। कुषाणों ने सोने के सिक्के चलाए जो 'दीनार' कहलाते थे।
मौर्योत्तर काल में व्यापार और वाणिज्य का विकास हुआ। रेशम मार्ग (Silk Route) के माध्यम से भारत का रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार होता था। भारत से मसाले, रत्न, मलमल और हाथी दाँत का निर्यात होता था जबकि सोने और चांदी का आयात होता था। सोने के सिक्के (दीनार) और चांदी के सिक्के (द्राम्म) चलन में थे। शहरों का विकास हुआ और व्यापारिक संघ (श्रेणियाँ) महत्वपूर्ण हो गए।
इस काल में बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ, विशेषकर महायान बौद्ध धर्म का। कुषाण शासक कनिष्क बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था। इसी काल में हिन्दू धर्म में भक्ति आंदोलन की शुरुआत हुई। भागवत धर्म (वैष्णव धर्म) का विकास हुआ और विष्णु व शिव की पूजा लोकप्रिय हुई। जैन धर्म का भी प्रसार हुआ, विशेषकर दक्षिण भारत में।
मौर्योत्तर काल में कला के क्षेत्र में गांधार, मथुरा और अमरावती शैलियों का विकास हुआ। गांधार कला यूनानी और भारतीय शैली का मिश्रण थी। मथुरा कला शैली पूर्णतः भारतीय थी। बौद्ध स्तूपों (सांची, भरहुत, अमरावती) और चैत्यों का निर्माण हुआ। अजंता और एलोरा की गुफाएँ भी इसी काल में बनीं।
व्याख्या: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की और मगध पर शासन किया। शुंग वंश ने लगभग 112 वर्षों तक शासन किया।
व्याख्या: पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ किए, जो उसकी सैन्य सफलताओं का प्रतीक थे। यज्ञों के दौरान अश्व को छोड़ा जाता था और जहाँ तक वह जाता था, उस क्षेत्र को शासक के अधीन माना जाता था।
व्याख्या: कुषाण शासक कनिष्क बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था। उसने कश्मीर में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया था। उसके शासनकाल में बौद्ध धर्म का महायान संप्रदाय विकसित हुआ।
व्याख्या: 'मिलिंदपन्हो' एक बौद्ध ग्रंथ है जिसमें यूनानी शासक मेनांडर (मिलिंद) और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच धार्मिक वार्तालाप है। यह पाली भाषा में लिखा गया है और बौद्ध दर्शन पर महत्वपूर्ण स्रोत है।
व्याख्या: गौतमीपुत्र शातकर्णी सातवाहन वंश का सबसे प्रतापी शासक था। उसने शक, यवन और पह्लवों को पराजित किया। नासिक अभिलेख में उसे 'एकबाम्भन' (एक ही ब्राह्मण) कहा गया है जो शकों के विनाशक के रूप में प्रसिद्ध था।
व्याख्या: कुषाण सम्राट कनिष्क ने 78 ईस्वी में अपने राज्यारोहण के अवसर पर शक संवत की शुरुआत की। यह आज भी भारत सरकार द्वारा आधिकारिक कैलेंडर के रूप में उपयोग किया जाता है।
व्याख्या: 'चरक संहिता' आयुर्वेद का एक मौलिक ग्रंथ है। इसकी रचना आचार्य चरक ने की थी, जो कनिष्क के राजवैद्य माने जाते हैं।
व्याख्या: गांधार कला शैली पर यूनानी (हेलेनिस्टिक) कला का गहरा प्रभाव था, इसलिए इसे इंडो-ग्रीक या ग्रीको-बौद्ध कला भी कहा जाता है। इसमें बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी देवता अपोलो की तरह बनाई गईं।
व्याख्या: सातवाहनों ने अपने अभिलेखों और प्रशासनिक कार्यों में प्राकृत भाषा का प्रयोग किया। उनकी लिपि ब्राह्मी थी।
व्याख्या: भारत में व्यवस्थित रूप से सोने के सिक्के जारी करने का श्रेय इंडो-ग्रीक (हिन्द-यवन) शासकों को दिया जाता है। हालांकि, बड़े पैमाने पर शुद्ध सोने के सिक्के कुषाणों ने चलाए।
व्याख्या: शक शासक रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत भाषा का पहला लंबा अभिलेख है। इसमें सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का वर्णन है।
व्याख्या: 'बुद्धचरित' भगवान बुद्ध की जीवनी है, जिसे संस्कृत महाकाव्य के रूप में अश्वघोष ने लिखा था। अश्वघोष कनिष्क के दरबार में एक प्रमुख विद्वान थे।
व्याख्या: मथुरा कला शैली, जो पूर्णतः स्वदेशी थी, का विकास मुख्य रूप से कुषाणों के शासनकाल में हुआ। इस शैली में लाल बलुआ पत्थर का उपयोग होता था और इसमें बौद्ध, जैन और हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई गईं।
व्याख्या: सातवाहन शासक अपने नाम के आगे अपनी माता का नाम लगाते थे, जैसे गौतमीपुत्र शातकर्णी और वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी। यह मातृसत्तात्मक समाज का संकेत नहीं है, बल्कि माताओं के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
व्याख्या: 'गाथासप्तशती' प्रेम कविताओं का एक संग्रह है, जिसकी रचना सातवाहन शासक हाल ने की थी। यह प्राकृत भाषा में लिखा गया एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य है।
व्याख्या: शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था। उसकी हत्या उसके मंत्री वासुदेव कण्व ने कर दी और कण्व वंश की स्थापना की।
व्याख्या: कनिष्क के विशाल साम्राज्य की मुख्य राजधानी पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर, पाकिस्तान) थी। मथुरा उसके साम्राज्य की दूसरी महत्वपूर्ण राजधानी थी।
व्याख्या: मौर्योत्तर काल में व्यापार और उद्योग के विकास के साथ, एक ही व्यवसाय के लोगों ने अपने संघ बना लिए, जिन्हें 'श्रेणी' कहा जाता था। ये श्रेणियाँ बैंक का काम भी करती थीं।
व्याख्या: हाथीगुम्फा अभिलेख (ओडिशा) कलिंग के चेदि वंश के राजा खारवेल से संबंधित है। यह उनके शासनकाल की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण देता है।
व्याख्या: कुषाणों ने मध्य एशिया से गुजरने वाले प्रसिद्ध रेशम मार्ग की एक महत्वपूर्ण शाखा पर नियंत्रण कर लिया था। इस मार्ग से होने वाले व्यापार पर कर लगाकर उन्होंने बहुत धन कमाया।
व्याख्या: कनिष्क के शासनकाल में आयोजित चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म स्पष्ट रूप से हीनयान और महायान नामक दो संप्रदायों में विभाजित हो गया। कनिष्क ने महायान संप्रदाय को संरक्षण दिया।
व्याख्या: अमरावती कला शैली का विकास मुख्य रूप से कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र (आंध्र प्रदेश) में सातवाहनों और उनके उत्तराधिकारी इक्ष्वाकुओं के संरक्षण में हुआ। इसमें संगमरमर का उपयोग होता था और यह अपनी कथात्मक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है।
व्याख्या: बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ने 'माध्यमिक कारिका' में शून्यवाद (सापेक्षता का सिद्धांत) का प्रतिपादन किया। उनके इस सिद्धांत की तुलना आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से की जाती है, इसलिए उन्हें 'भारत का आइंस्टीन' कहा जाता है।
व्याख्या: कुषाण मध्य एशिया की यू-ची नामक एक खानाबदोश जनजाति की एक शाखा थे। वे चीन की महान दीवार के पास रहते थे और बाद में भारत की ओर चले आए।
व्याख्या: भारत में भूमि अनुदान देने की प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य सातवाहनों के काल का मिलता है। उन्होंने ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि दान में दी।
व्याख्या: महान व्याकरणविद् पतंजलि, जिन्होंने पाणिनी के 'अष्टाध्यायी' पर अपनी टीका 'महाभाष्य' लिखी, शुंग शासक पुष्यमित्र शुंग के समकालीन थे। माना जाता है कि उन्होंने पुष्यमित्र के अश्वमेध यज्ञों का संचालन किया था।
व्याख्या: इंडो-ग्रीक राजा एंटियालकिड्स के राजदूत हेलियोडोरस ने शुंग राजा भागभद्र के दरबार में बेसनगर (विदिशा) में एक गरुड़ स्तंभ स्थापित करवाया था। यह भागवत धर्म (वैष्णव धर्म) को अपनाने का एक प्रारंभिक प्रमाण है।
व्याख्या: मौर्योत्तर काल में, विशेषकर कुषाणों और सातवाहनों के समय, भारत और रोमन साम्राज्य के बीच समुद्री व्यापार अपने चरम पर था। भारत से मसाले, कपड़े और कीमती पत्थरों का निर्यात होता था, जबकि रोम से बड़ी मात्रा में सोने के सिक्के भारत आते थे।
व्याख्या: 'सुश्रुत संहिता' प्राचीन भारत का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है जो शल्य चिकित्सा (सर्जरी) पर आधारित है। सुश्रुत को 'शल्य चिकित्सा का जनक' भी कहा जाता है।
व्याख्या: वासुदेव कण्व ने 73 ईसा पूर्व में अंतिम शुंग शासक देवभूति की हत्या करके कण्व वंश की स्थापना की। यह वंश बहुत छोटा था और लगभग 45 वर्षों तक ही चला।
व्याख्या: इससे पहले बुद्ध को प्रतीकों (जैसे स्तूप, बोधि वृक्ष, पदचिह्न) के रूप में दर्शाया जाता था। गांधार और मथुरा कला शैलियों में पहली बार बुद्ध को मानव रूप में चित्रित किया गया, जो कुषाण काल की एक बड़ी उपलब्धि थी।
व्याख्या: सातवाहनों की राजधानी महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के तट पर स्थित प्रतिष्ठान (आधुनिक पैठन) थी। अमरावती और नागार्जुनकोंडा उनके महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र थे।
व्याख्या: 'पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी' एक अज्ञात यूनानी नाविक द्वारा लिखी गई पुस्तक है जो भारत-रोमन व्यापार का विस्तृत विवरण देती है। इसमें भरुकच्छ (गुजरात), मुजिरिस (केरल) और ताम्रलिप्ति (बंगाल) जैसे कई महत्वपूर्ण बंदरगाहों का उल्लेख है।
व्याख्या: कुषाणों ने बड़ी संख्या में शुद्ध सोने के सिक्के जारी किए, जो रोमन सिक्कों से प्रभावित थे और दीनार कहलाते थे। इन सिक्कों ने व्यापार को बहुत बढ़ावा दिया।
व्याख्या: मध्य प्रदेश में स्थित भरहुत स्तूप की वेदिका (रेलिंग) और तोरण द्वारों का निर्माण शुंग काल में हुआ था। यह शुंग कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
व्याख्या: कुषाण शासक कनिष्क ने 'देवपुत्र' और 'महाराजाधिराज' जैसी भव्य उपाधियाँ धारण कीं, जो उनके विशाल साम्राज्य और शक्ति को दर्शाती हैं।
व्याख्या: सातवाहन प्रशासन में, 'गौल्मिक' एक सैन्य टुकड़ी का प्रमुख होता था जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में शांति और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दी जाती थी। वह एक प्रकार का ग्रामीण प्रशासक था।
व्याख्या: माना जाता है कि भारतीय रंगमंच में पर्दे (जिसे 'यवनिका' कहा जाता है) का प्रयोग यूनानियों (यवनों) के संपर्क के परिणामस्वरूप शुरू हुआ। 'यवनिका' शब्द 'यवन' से ही बना है।
व्याख्या: 'मालविकाग्निमित्रम्' का नायक अग्निमित्र, शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था। यह नाटक अग्निमित्र और मालविका की प्रेम कहानी पर आधारित है।
व्याख्या: सातवाहनों ने विभिन्न प्रकार की धातुओं के सिक्के चलाए, जिनमें सीसा (Lead) और पोटीन (तांबा, टिन, सीसा और जस्ता का मिश्रण) प्रमुख थे। वे शीशे के सिक्के जारी करने वाले पहले भारतीय शासक थे।
व्याख्या: चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन कुषाण शासक कनिष्क के संरक्षण में कश्मीर के कुंडलवन में हुआ था। इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी और अश्वघोष इसके उपाध्यक्ष थे।
व्याख्या: सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक प्रशस्ति में 'एकब्राह्मण' (अद्वितीय ब्राह्मण) और 'क्षत्रिय-दर्प-मान-मर्दन' (क्षत्रिय के अभिमान को चूर करने वाला) कहा गया है।
व्याख्या: कुजुल कडफिसेस (कडफिसेस प्रथम) ने यू-ची कबीलों को एकजुट किया और भारत में कुषाण साम्राज्य की नींव रखी।
व्याख्या: कुषाण शासक विम कडफिसेस (कडफिसेस द्वितीय) को भारत में बड़े पैमाने पर नियमित रूप से सोने के सिक्के जारी करने का श्रेय दिया जाता है। इन सिक्कों पर शिव, नंदी और त्रिशूल के चित्र मिलते हैं।
व्याख्या: हालांकि सांची के मूल स्तूप का निर्माण अशोक ने करवाया था, लेकिन इसके चारों ओर पत्थर की वेदिका (रेलिंग) और तोरण द्वारों का निर्माण और विस्तार शुंग काल में किया गया था।
व्याख्या: मौर्योत्तर काल में वैष्णव धर्म (भागवत धर्म) का एक प्रमुख केंद्र मथुरा था। यहाँ से इस धर्म से संबंधित कई मूर्तियाँ और अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
व्याख्या: पारंपरिक मान्यता के अनुसार, उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व में शकों पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में विक्रम संवत की शुरुआत की थी।
व्याख्या: शक शासकों ने अपने विशाल साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित किया था, जहाँ वे राज्यपाल नियुक्त करते थे। इन राज्यपालों को 'क्षत्रप' या 'महाक्षत्रप' कहा जाता था।
व्याख्या: अजंता की कुछ सबसे पुरानी गुफाओं (जैसे गुफा संख्या 9 और 10) का निर्माण सातवाहन काल में लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में शुरू हुआ था। बाद में वाकाटक और गुप्त काल में इसका और विस्तार हुआ।
व्याख्या: 'मिलिंदपन्हो' (मिलिंद के प्रश्न) एक महत्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथ है जो पाली भाषा में लिखा गया है। इसमें इंडो-ग्रीक राजा मेनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद है।
व्याख्या: कनिष्क का दरबार विद्वानों से भरा रहता था। अश्वघोष (कवि), नागार्जुन (दार्शनिक), वसुमित्र (विद्वान) और चरक (चिकित्सक) जैसे महान व्यक्ति उसके समकालीन थे।
व्याख्या: मौर्यों द्वारा निर्मित सुदर्शन झील (गुजरात) जब टूट गई, तो शक शासक रुद्रदामन प्रथम ने अपने निजी कोष से इसका जीर्णोद्धार (मरम्मत) करवाया, जिसका उल्लेख जूनागढ़ अभिलेख में है।
व्याख्या: ताम्रलिप्ति (आधुनिक तामलुक, पश्चिम बंगाल) मौर्योत्तर काल में पूर्वी तट का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह था। यहाँ से दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के लिए व्यापार होता था।
व्याख्या: सातवाहन शासकों को 'दक्षिणापथपति' (दक्षिण पथ का स्वामी) कहा जाता था क्योंकि उनका साम्राज्य दक्कन के एक बड़े हिस्से में फैला हुआ था और वे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक सेतु का काम करते थे।
व्याख्या: कुषाण शासक चीनी सम्राटों से प्रभावित होकर 'देवपुत्र' (देवता का पुत्र) की उपाधि धारण करते थे। यह राजा के दैवीय अधिकार को स्थापित करने का एक प्रयास था।
व्याख्या: गोंडोफर्नेस भारत में पार्थियन (पह्लव) शक्ति का संस्थापक और सबसे प्रसिद्ध शासक था। ईसाई परंपरा के अनुसार, ईसा मसीह के शिष्य सेंट थॉमस उनके शासनकाल में ईसाई धर्म का प्रचार करने भारत आए थे।
व्याख्या: मौर्योत्तर काल की पहचान एक जीवंत अर्थव्यवस्था से होती है, जिसमें रोमन साम्राज्य और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ बढ़ता विदेशी व्यापार, सिक्कों का व्यापक उपयोग, श्रेणियों (व्यापार संघों) का उदय और कई नए शहरी केंद्रों का विकास शामिल है।
व्याख्या: यूनानी-रोमन प्रभाव के कारण, गांधार कला में मानव शरीर का यथार्थवादी चित्रण किया गया। बुद्ध की मूर्तियों में मांसपेशियों, लहराते बाल और कपड़ों की सिलवटों को स्पष्ट रूप से दिखाया गया है, जो यूनानी देवता अपोलो से मिलता-जुलता है।
व्याख्या: सातवाहनों ने चांदी और तांबे के सिक्के भी जारी किए, लेकिन उनके अधिकांश सिक्के सीसे के बने होते थे, जो उस समय के लिए एक अनूठी विशेषता थी।
व्याख्या: 'सौन्दरानन्द' संस्कृत का एक महाकाव्य है जिसकी रचना अश्वघोष ने की थी। इसमें बुद्ध के सौतेले भाई नंद के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने की कहानी है। अश्वघोष ने 'बुद्धचरित' भी लिखा था।
व्याख्या: मौर्योत्तर काल के संदर्भ में, 'निगम' शब्द का प्रयोग अक्सर व्यापारियों के एक शक्तिशाली संगठन (गिल्ड) या एक बाज़ार वाले शहर (market town) के लिए किया जाता था।
व्याख्या: कनिष्क की एक प्रसिद्ध सिर-विहीन बलुआ पत्थर की मूर्ति मथुरा के पास माट नामक स्थान से मिली है। इसमें वह एक योद्धा की वेशभूषा में दिखाए गए हैं। यह मथुरा कला शैली का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
व्याख्या: भक्ति आंदोलन ने मोक्ष प्राप्ति के लिए यज्ञ और जटिल कर्मकांडों के स्थान पर ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत प्रेम और समर्पण (भक्ति) पर जोर दिया। यह आम लोगों के लिए एक सरल और सुलभ मार्ग था, जो इसे लोकप्रिय बनाता था।
यह मौर्योत्तर काल पर एक विस्तृत अध्ययन सामग्री है। अपनी तैयारी को और मजबूत करने के लिए इन प्रश्नों का अभ्यास करें।