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  • पल्लव साम्राज्य (Pallava dynasty in Hindi)

    पल्लव साम्राज्य (Pallava dynasty in Hindi)

    पल्लव साम्राज्य (Pallava dynasty in Hindi) इक्ष्वाकुओं को अपदस्थ करके उनके स्थान पर पल्लव आए। पल्लव शब्द का अर्थ लता का वाचक है। दक्षिण भारत में एक दुर्जेय शक्ति के रूप में उभरे, जिनकी उपस्थिति 275 ईसा पूर्व से 897 ईसा पूर्व तक मानी जाती है। पल्लव राजवंश (Pallava dynasty in Hindi) ने लगभग 500 वर्षों तक अपने शासन का संचालन कुशलतापूर्वक बनाए रखा। सातवाहन वंश के पतन के बाद पल्लवों को प्रमुखता मिली। पल्लवों ने सातवाहन वंश को सामंतों के रूप में अपनी सेवाएं दीं थीं। महेंद्रवर्मन प्रथम और नरसिंहवर्मन प्रथम के शासनकाल के दौरान पल्लव राजवंश एक प्रमुख शक्ति बन गया। 9वीं शताब्दी ईस्वी में चोल शासक आदित्य प्रथम द्वारा पल्लवों को अंततः पराजित किया गया था।

    पल्लव वंश के प्रमुख शासक

    Major Rulers of the Pallava Dynasty

    प्रारंभिक पल्लव

    • सिंहवर्मन प्रथम : इसका शासनकाल लगभग 275 ईसापूर्व से 300 ईसापूर्व तक माना जाता है।
    • शिवस्कंदवर्मन : इसका शासनकाल की सही तिथि ज्ञात नहीं है। इसे लेकर वि‌द्वानों में मतभेद है। इसे प्रारंभिक शासकों में सबसे महान शासक माना जाता है। कुछ वि‌द्वानो का मानना है की इसने चौथी शताब्दी ई. की शुरुआत में शासन किया। इसने कई अश्वमेध और अन्य वैदिक यज्ञ करवाए।
    • विजयस्कन्दवर्मन : इसका शासनकाल की सही तिथि ज्ञात नहीं है। इसके शासनकाल को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है।
    • स्कंदवर्मन : शासनकाल अज्ञात है।
    • विष्णुगोपा प्रथम : इसका शासनकाल लगभग 350 ईसापूर्व से 355 ईसापूर्व तक माना जाता है।
    • कुमारविष्णु प्रथम : इसने 350 ईसा पूर्व से 370 ईसा पूर्व तक शासन किया।
    • स्कंदवर्मन द्वितीय : इसने 370 ईसा पूर्व से 385 ईसा पूर्व तक शासन किया।
    • वीरवर्मन : इसका जात शासनकाल 385 ईसा पूर्व से 400 ईसा पूर्व तक है।
    • स्कंदवर्मन III: इसका शासनकाल 400 ईसा पूर्व से लेकर 436 ईसा पूर्व तक माना जाता है।
    • सिंहवर्मन द्वितीय : इसका शासनकाल 436 ईसा पूर्व से लेकर 460 ईसा पूर्व तक माना जाता है। (436- 460)
    • स्कंदवर्मन तुर्थ: इसका शासनकाल 460 ईसा पूर्व से लेकर 480 ईसा पूर्व तक माना जाता है। (460-480)
    • नंदीवर्मन प्रथम : इसका जात शासनकाल 480 ईसा पूर्व से 510 ईसा पूर्व तक है। (480-510)
    • कुमारविष्णु ‌द्वितीय : शासनकाल वर्ष 510 ईसा पूर्व से 530 ईसा पूर्व तक है।
    • बुद्धवर्मन : इसका शासनकाल 530 ईसा पूर्व से 540 ईसा पूर्व तक है।
    • कुमारविष्णु III : इसका शासनकाल 540 ईसा पूर्व से 550 ईसा पूर्व तक है।
    • सिंहवर्मन III : इसका शासनकाल 550 ईसा पूर्व से 560 ईसा पूर्व तक है।

    बाद के पल्लव शासक

    • महेंद्रवर्मन प्रथम ने पल्लव साम्राज्य का विस्तार किया और उसका शासनकाल सबसे महान संप्रभुओं में से एक था।
    • दक्षिण भारत में कुछ सबसे अलंकृत स्मारक और मंदिर, ठोस चट्टान से तराशे गए कलाकृतियाँ उसके शासन के तहत पेश किए गए थे।
    • उसने मत्तविलास प्रहसन नाटक भी लिखा था।
    • पल्लव साम्राज्य ने क्षेत्र और प्रभाव दोनों में प्रसि‌द्धि हासिल करना शुरू कर दिया और 6 वीं शताब्दी के अंत तक सीलोन और मुख्य भूमि तमिलक्कम के राजाओं को हराकर एक क्षेत्रीय शक्ति बन गया।
    • नरसिंहवर्मन । और परमेश्वरवर्मन । सैन्य और स्थापत्य दोनों क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं।
    • नरसिंहवर्मन द्वितीय द्वारा शोर मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

    बाद के पल्लव शासकों का क्रम इस प्राकार है:

    • सिंहविष्णु (575-600 इसापूर्व)
    • महेंद्रवर्मन प्रथम (600-630 इसापूर्व)
    • नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 इसापूर्व)
    • महेंद्रवर्मन द्वितीय (668-672 इसापूर्व)
    • परमेश्वरवर्मन प्रथम (670-695 इसापूर्व)
    • नरसिंहवर्मन ।। (राजा सिंह) (695-722 इसापूर्व)
    • परमेश्वरवर्मन द्वितीय (705-710 इसापूर्व)

    कुछ महत्वपूर्ण पल्लव शासको के बारे में जानकारी

    सिंहविष्णु (575-600 ई.)

    • पल्लवों का प्रथम प्रमुख शासक सिंहविष्णु था। उसने अवनिसिंह की उपाधि धारण की थी। वह एक वीर व पराक्रमी शासक था। उसने चेर, चोल, पाण्ड्य, मलय, मालवा, कलभ्र व सिंहल के राजाओं को युद्ध में पराजित कर अपनी शक्ति का विस्तार किया था।
    • सिंहविष्णु वैष्णव मतानुयायी था जिसने जिसने कला को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया। उसके समय में मामल्लपुरम् के आदिवाराह गुहा मंदिर का निर्माण कराया गया था। इस मंदिर में सिंहविष्णु व उसकी दो रानियों की प्रतिमा स्थापित की गई है।
    • सिंहविष्णु की राजसभा में संस्कृत महाकवि भारवि निवास करते थे जिन्होंने किरातार्जुनियम महाकाव्य की रचना की थी।

    महेन्द्रवर्मन-1 (600-630 ई.)

    • सिंहविष्णु का उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन । बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। इसने मत्तविलास प्रहसन तथा भगवदज्जुकीयम् लिखा था। इसके समकालीन चालुक्य (बादामी) सम्राट पुलकेशिन-॥ ने महेन्द्रवर्मन प्रथम पर आक्रमण कर पल्लवों व चालुक्यों के मध्य लंबे समय तक चलने वाले राजनीतिक संघर्ष को प्रारम्भ किया।
    • उसने शैव सन्त अप्पर के प्रभाव से जैन धर्म का परित्याग कर शैवमत ग्रहण कर लिया था।

    नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 ई.)

    • महेन्द्रवर्मन प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र नरसिंहवर्मन प्रथम कांची की राजगद्दी पर बैठा। नरसिंहवर्मन। पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। इसने परियल, मणिमंगलम् और शूरमार के युद्धों में पुलकेशिन द्वितीय को हराकर वातापीकोण्ड की उपाधि धारण की थी।
    • नरसिंहवर्मन प्रथम के शासनकाल में 641 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची आया था।
    • नरसिंहवर्मन प्रथम ने महामल्लपुरम्/मामल्लपुरम् (महाबलिपुरम्) नामक एक नए नगर की स्थापना की। इस नगर में उसने अनेक विशाल मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें से धर्मराज मंदिर अब तक विद्यमान है। उसने द्रविड़ शैली के जिस रूप का आरम्भ किया था उसे मामल्ल शैली कहा जाता है।

    नरसिंहवर्मन द्वितीय (700-725 ई.)

    • यह परमेश्वर वर्मन का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था। उसका शासनकाल शान्तिपूर्ण रहा और कला एवं साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
    • नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची का कैलाशनाथ मंदिर (राजसिद्धेवश्र मंदिर/राजसिंहेश्वर मंदिर) व ऐरावतेश्वर के विशाल मंदिर तथा मामल्लपुरम् के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया।
    • उसने राजसिंह, आगमप्रिय व शंकर भक्त आदि उपाधियाँ धारण कीं। नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची में घटिका (संस्कृत महाविद्यालय) की स्थापना की थी। नरसिंहवर्मन द्वितीय ने चीन में दूत मंडल भेजा (720 ई.) था।
    • पल्लवों के दूसरे महत्वपूर्ण समकालीन गंग थे जिन्होंने चौथी सदी के आसपास दक्षिणी कर्नाटक में अपना शासन स्थापित किया था। ये पश्चिमी गंग या मैसूर के गंग कहलाते थे।
    • पल्लवों ने अधिकांश कर मुक्त ग्रामदान ब्राह्मणों को दिए। आरंम्भिक पल्लवों के 16 भूमि अनुदान पत्र मिले हैं।
    • चौथी सदी में कलभ्रों के नेतृत्व में हुए विद्रोह का प्रभाव पल्लवों तथा उनके समकालीन पड़ोसियों पर पड़ा।

    पल्लव-चालुक्य संघर्ष

    • पल्लव-चालुक्य संघर्ष के क्रम में पहली महत्वपूर्ण घटना चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय (609-642 ई.) के शासनकाल में घटित हुई। उसके विषय में जानकारी ऐहोल अभिलेख से मिलती है। उसके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित प्रशस्ति उत्कीर्ण है। यह प्रशस्ति उस काल की काव्य-कला का उत्कृष्ट नमूना है।
    • अभिलेख से ज्ञात होता है कि, उसने कदम्बों की राजधानी बनवासी को अपने अधीन कर लिया। उसने नर्मदा के किनारे हर्ष की सेना को पराजित कर उसे दक्कन की ओर बढ़ने से रोक दिया था।
    • पुलकेशिन द्वितीय ने 610 ई. के आस-पास कृष्णा और गोदावरी का दोआब पल्लवों से छीन लिया जो वेंगी प्रान्त के
    • नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ पर मुख्य राजवंश की एक शाखा स्थापित की गई, जो वेंगी के चालुक्य राजवंश कहलाने लगे।
    • पल्लव राजा नरसिंहवर्मन (630-668 ई.) ने चालुक्य की राजधानी वातापी पर लगभग 642 ई. में अधिकार कर लिया। नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्ड अर्थात् वातापी विजेता की उपाधि धारण की थी।