5500 ई. पू. से 3500 ई. पू. तक नवपाषाण युग
बलूचिस्तान और सिंधु के मैदानी भागों में स्थिति मेहरगढ़ और फीली गुलमुहम्मद जैसी बस्तियां उभरीं। यहां लोग पशु चराने के साथ-साथ थोड़ा बहुत खेती का काम भी करते थे। इस प्रकार स्थायी गांवों का उद्भव हुआ। इस युग के लोग गेहूं, जौं, खजूर, तथा कपास की खेती की जानकारी रखते थे और भेड़ बकरियों और मवेशियों को पालते थे। साक्ष्य के रूप में मिट्टी के मकान, मिट्टी के बर्तन, और दस्तकारी की वस्तुएं मिली हैं।
3500 ई. पू. से 2600 ई. पू. तक आरम्भिक हड़प्पा काल
इस काल में पहाड़ों और मैदानों में बहुत सी बस्तियां स्थापित हुईं। इसी समय गांव सबसे अधिक संख्या में आबाद हुए। तांबा, चाक और हल का प्रयोग कर कई प्रकार के मिट्टी के अद्भुत बर्तन बनाए जाते थे जिससे कई क्षेत्रीय परम्पराओं के आरम्भ का पता चलता है। अन्न भंडार, ऊँची-ऊँची दीवारें और सुदूर व्यापार के प्रमाण मिले हैं। सारी सिंधु घाटी में मिट्टी के बर्तनों की एकरूपता के प्रमाण मिलते हैं। इसके साथ-साथ पीपल, कुबड़े बैलों, शेषनागों, सींगदार देवता आदि के रूपांकनों के प्रयोग के प्रमाण मिले हैं।
2600 ई. पू. से 1800 ई. पू. तक पूर्ण विकसित हड़प्पा युग
बड़े शहरों का अभ्युदय, समान आकार की ईंटें, तौलने के बाट, मुहरें, और मिट्टी के बर्तन, नियोजित ढंग से बसे हुए शहर और दूर-दूर स्थानों के साथ व्यापार।
1800 ई. पू. से आगे… उत्तर-हड़प्पा युग
हड़प्पा की सभ्यता के बहुत से शहर खाली हो गए, अंतर-क्षेत्रीय विनिमय में ह्रास हुआ, लेखन कार्य और शहरी जीवन का त्याग कर दिया गया। हड़प्पा की सभ्यता के शिल्प और मिट्टी के बर्तनों की परम्परा जारी रही। पंजाब सतलुज यमुना की ग्रामीण संस्कृतियों का विभाजन और गुजरात में हड़प्पा की शिल्प और मिट्टी के बर्तनों की परंपराओं का अपनाया जाना।
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