Category: Ancient India

Ancient India is the period of human civilization in India from prehistoric times until the Mauryan Empire.
Indus Valley Civilization
Varna system
Mauryan Empire
Gupta Empire
Religion

Ancient India is the Indian subcontinent from prehistoric times to the start of Medieval India, which is typically dated (when the term is still used) to the end of the Gupta Empire around 500 CE.

  • प्रतिहार राजवंश

    प्रतिहार राजवंश

    प्रतिहार अग्निकुल के राजपूतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध वंश था। ग्वालियर प्रशस्ति में इन्हें राम के छोटे भाई लक्ष्मण का वंशज बताया गया है। इस वंश की स्थापना हरिश्चंद्र नामक राजा ने की, किन्तु इस वंश का प्रथम वास्तविक शासक नागभट्ट प्रथम था। प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार भी कहा जाता है। प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक और इस राजवंश का महानतम शासक भोज था। गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में हुआ है उसने प्रतिहार साम्राज्य का पुनर्निर्माण किया तथा लगभग 838 ई. में कन्नौज पर फिर से अधिकार कर लिया। यह नगर लगभग एक सदी तक प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी रहा।

    भोज (836-885 ई.) विष्णु का भक्त था तथा उसने आदिवराह का विरुद (रूप) धारण किया था। उसके कुछ सिक्कों पर आदिवराह शब्द अंकित है। भोज परमार से उसका अंतर बताने के लिए उसे मिहिर भोज भी कहा जाता है। बगदाद-निवासी अल-मसूदी ने 915-916 ई. में गुजरात की यात्रा की थी। उसने गुर्जर-प्रतिहार राज्य को अल-जुजूर कहा है। अल-मसूदी बताता है कि अल-जुजूर के साम्राज्य में 18,000,00 गाँव, नगर और ग्रामीण क्षेत्र थे। राजा की सेना में चार चमुएँ (डिवीजन) थीं। प्रत्येक चमू में 7 से 9 लाख लोग थे। उसके पास युद्ध के लिए केवल 2,000 प्रशिक्षित हाथी थे। उसकी अश्वारोही सेना देश में सर्वश्रेष्ठ थी। संस्कृत का महान कवि और नाटककार राजशेखर भोज के पौत्र महिपाल के दरबार में रहता था। इसने इसे रघुकुल तिलक और रघुकुल ग्रामिणी कहा था। 915 ई. से 918 ई. के बीच राष्ट्रकूट राजा इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा इस नगर को नष्ट कर दिया। 963 ई. में एक अन्य राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय ने उत्तर भारत पर आक्रमण कर प्रतिहार शासक को परास्त कर दिया।

  • पल्लव साम्राज्य (Pallava dynasty in Hindi)

    पल्लव साम्राज्य (Pallava dynasty in Hindi)

    पल्लव साम्राज्य (Pallava dynasty in Hindi) इक्ष्वाकुओं को अपदस्थ करके उनके स्थान पर पल्लव आए। पल्लव शब्द का अर्थ लता का वाचक है। दक्षिण भारत में एक दुर्जेय शक्ति के रूप में उभरे, जिनकी उपस्थिति 275 ईसा पूर्व से 897 ईसा पूर्व तक मानी जाती है। पल्लव राजवंश (Pallava dynasty in Hindi) ने लगभग 500 वर्षों तक अपने शासन का संचालन कुशलतापूर्वक बनाए रखा। सातवाहन वंश के पतन के बाद पल्लवों को प्रमुखता मिली। पल्लवों ने सातवाहन वंश को सामंतों के रूप में अपनी सेवाएं दीं थीं। महेंद्रवर्मन प्रथम और नरसिंहवर्मन प्रथम के शासनकाल के दौरान पल्लव राजवंश एक प्रमुख शक्ति बन गया। 9वीं शताब्दी ईस्वी में चोल शासक आदित्य प्रथम द्वारा पल्लवों को अंततः पराजित किया गया था।

    पल्लव वंश के प्रमुख शासक

    Major Rulers of the Pallava Dynasty

    प्रारंभिक पल्लव

    • सिंहवर्मन प्रथम : इसका शासनकाल लगभग 275 ईसापूर्व से 300 ईसापूर्व तक माना जाता है।
    • शिवस्कंदवर्मन : इसका शासनकाल की सही तिथि ज्ञात नहीं है। इसे लेकर वि‌द्वानों में मतभेद है। इसे प्रारंभिक शासकों में सबसे महान शासक माना जाता है। कुछ वि‌द्वानो का मानना है की इसने चौथी शताब्दी ई. की शुरुआत में शासन किया। इसने कई अश्वमेध और अन्य वैदिक यज्ञ करवाए।
    • विजयस्कन्दवर्मन : इसका शासनकाल की सही तिथि ज्ञात नहीं है। इसके शासनकाल को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है।
    • स्कंदवर्मन : शासनकाल अज्ञात है।
    • विष्णुगोपा प्रथम : इसका शासनकाल लगभग 350 ईसापूर्व से 355 ईसापूर्व तक माना जाता है।
    • कुमारविष्णु प्रथम : इसने 350 ईसा पूर्व से 370 ईसा पूर्व तक शासन किया।
    • स्कंदवर्मन द्वितीय : इसने 370 ईसा पूर्व से 385 ईसा पूर्व तक शासन किया।
    • वीरवर्मन : इसका जात शासनकाल 385 ईसा पूर्व से 400 ईसा पूर्व तक है।
    • स्कंदवर्मन III: इसका शासनकाल 400 ईसा पूर्व से लेकर 436 ईसा पूर्व तक माना जाता है।
    • सिंहवर्मन द्वितीय : इसका शासनकाल 436 ईसा पूर्व से लेकर 460 ईसा पूर्व तक माना जाता है। (436- 460)
    • स्कंदवर्मन तुर्थ: इसका शासनकाल 460 ईसा पूर्व से लेकर 480 ईसा पूर्व तक माना जाता है। (460-480)
    • नंदीवर्मन प्रथम : इसका जात शासनकाल 480 ईसा पूर्व से 510 ईसा पूर्व तक है। (480-510)
    • कुमारविष्णु ‌द्वितीय : शासनकाल वर्ष 510 ईसा पूर्व से 530 ईसा पूर्व तक है।
    • बुद्धवर्मन : इसका शासनकाल 530 ईसा पूर्व से 540 ईसा पूर्व तक है।
    • कुमारविष्णु III : इसका शासनकाल 540 ईसा पूर्व से 550 ईसा पूर्व तक है।
    • सिंहवर्मन III : इसका शासनकाल 550 ईसा पूर्व से 560 ईसा पूर्व तक है।

    बाद के पल्लव शासक

    • महेंद्रवर्मन प्रथम ने पल्लव साम्राज्य का विस्तार किया और उसका शासनकाल सबसे महान संप्रभुओं में से एक था।
    • दक्षिण भारत में कुछ सबसे अलंकृत स्मारक और मंदिर, ठोस चट्टान से तराशे गए कलाकृतियाँ उसके शासन के तहत पेश किए गए थे।
    • उसने मत्तविलास प्रहसन नाटक भी लिखा था।
    • पल्लव साम्राज्य ने क्षेत्र और प्रभाव दोनों में प्रसि‌द्धि हासिल करना शुरू कर दिया और 6 वीं शताब्दी के अंत तक सीलोन और मुख्य भूमि तमिलक्कम के राजाओं को हराकर एक क्षेत्रीय शक्ति बन गया।
    • नरसिंहवर्मन । और परमेश्वरवर्मन । सैन्य और स्थापत्य दोनों क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं।
    • नरसिंहवर्मन द्वितीय द्वारा शोर मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

    बाद के पल्लव शासकों का क्रम इस प्राकार है:

    • सिंहविष्णु (575-600 इसापूर्व)
    • महेंद्रवर्मन प्रथम (600-630 इसापूर्व)
    • नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 इसापूर्व)
    • महेंद्रवर्मन द्वितीय (668-672 इसापूर्व)
    • परमेश्वरवर्मन प्रथम (670-695 इसापूर्व)
    • नरसिंहवर्मन ।। (राजा सिंह) (695-722 इसापूर्व)
    • परमेश्वरवर्मन द्वितीय (705-710 इसापूर्व)

    कुछ महत्वपूर्ण पल्लव शासको के बारे में जानकारी

    सिंहविष्णु (575-600 ई.)

    • पल्लवों का प्रथम प्रमुख शासक सिंहविष्णु था। उसने अवनिसिंह की उपाधि धारण की थी। वह एक वीर व पराक्रमी शासक था। उसने चेर, चोल, पाण्ड्य, मलय, मालवा, कलभ्र व सिंहल के राजाओं को युद्ध में पराजित कर अपनी शक्ति का विस्तार किया था।
    • सिंहविष्णु वैष्णव मतानुयायी था जिसने जिसने कला को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया। उसके समय में मामल्लपुरम् के आदिवाराह गुहा मंदिर का निर्माण कराया गया था। इस मंदिर में सिंहविष्णु व उसकी दो रानियों की प्रतिमा स्थापित की गई है।
    • सिंहविष्णु की राजसभा में संस्कृत महाकवि भारवि निवास करते थे जिन्होंने किरातार्जुनियम महाकाव्य की रचना की थी।

    महेन्द्रवर्मन-1 (600-630 ई.)

    • सिंहविष्णु का उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन । बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। इसने मत्तविलास प्रहसन तथा भगवदज्जुकीयम् लिखा था। इसके समकालीन चालुक्य (बादामी) सम्राट पुलकेशिन-॥ ने महेन्द्रवर्मन प्रथम पर आक्रमण कर पल्लवों व चालुक्यों के मध्य लंबे समय तक चलने वाले राजनीतिक संघर्ष को प्रारम्भ किया।
    • उसने शैव सन्त अप्पर के प्रभाव से जैन धर्म का परित्याग कर शैवमत ग्रहण कर लिया था।

    नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 ई.)

    • महेन्द्रवर्मन प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र नरसिंहवर्मन प्रथम कांची की राजगद्दी पर बैठा। नरसिंहवर्मन। पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। इसने परियल, मणिमंगलम् और शूरमार के युद्धों में पुलकेशिन द्वितीय को हराकर वातापीकोण्ड की उपाधि धारण की थी।
    • नरसिंहवर्मन प्रथम के शासनकाल में 641 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची आया था।
    • नरसिंहवर्मन प्रथम ने महामल्लपुरम्/मामल्लपुरम् (महाबलिपुरम्) नामक एक नए नगर की स्थापना की। इस नगर में उसने अनेक विशाल मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें से धर्मराज मंदिर अब तक विद्यमान है। उसने द्रविड़ शैली के जिस रूप का आरम्भ किया था उसे मामल्ल शैली कहा जाता है।

    नरसिंहवर्मन द्वितीय (700-725 ई.)

    • यह परमेश्वर वर्मन का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था। उसका शासनकाल शान्तिपूर्ण रहा और कला एवं साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
    • नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची का कैलाशनाथ मंदिर (राजसिद्धेवश्र मंदिर/राजसिंहेश्वर मंदिर) व ऐरावतेश्वर के विशाल मंदिर तथा मामल्लपुरम् के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया।
    • उसने राजसिंह, आगमप्रिय व शंकर भक्त आदि उपाधियाँ धारण कीं। नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची में घटिका (संस्कृत महाविद्यालय) की स्थापना की थी। नरसिंहवर्मन द्वितीय ने चीन में दूत मंडल भेजा (720 ई.) था।
    • पल्लवों के दूसरे महत्वपूर्ण समकालीन गंग थे जिन्होंने चौथी सदी के आसपास दक्षिणी कर्नाटक में अपना शासन स्थापित किया था। ये पश्चिमी गंग या मैसूर के गंग कहलाते थे।
    • पल्लवों ने अधिकांश कर मुक्त ग्रामदान ब्राह्मणों को दिए। आरंम्भिक पल्लवों के 16 भूमि अनुदान पत्र मिले हैं।
    • चौथी सदी में कलभ्रों के नेतृत्व में हुए विद्रोह का प्रभाव पल्लवों तथा उनके समकालीन पड़ोसियों पर पड़ा।

    पल्लव-चालुक्य संघर्ष

    • पल्लव-चालुक्य संघर्ष के क्रम में पहली महत्वपूर्ण घटना चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय (609-642 ई.) के शासनकाल में घटित हुई। उसके विषय में जानकारी ऐहोल अभिलेख से मिलती है। उसके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित प्रशस्ति उत्कीर्ण है। यह प्रशस्ति उस काल की काव्य-कला का उत्कृष्ट नमूना है।
    • अभिलेख से ज्ञात होता है कि, उसने कदम्बों की राजधानी बनवासी को अपने अधीन कर लिया। उसने नर्मदा के किनारे हर्ष की सेना को पराजित कर उसे दक्कन की ओर बढ़ने से रोक दिया था।
    • पुलकेशिन द्वितीय ने 610 ई. के आस-पास कृष्णा और गोदावरी का दोआब पल्लवों से छीन लिया जो वेंगी प्रान्त के
    • नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ पर मुख्य राजवंश की एक शाखा स्थापित की गई, जो वेंगी के चालुक्य राजवंश कहलाने लगे।
    • पल्लव राजा नरसिंहवर्मन (630-668 ई.) ने चालुक्य की राजधानी वातापी पर लगभग 642 ई. में अधिकार कर लिया। नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्ड अर्थात् वातापी विजेता की उपाधि धारण की थी।

     

  • कलिंग युद्ध (battle of kaling in hindi)

    कलिंग युद्ध (battle of kaling in hindi)

    अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य एवं बन्दुिसार की तरह ही मौर्य राजवंश का एक महान शासक हुआ जसिने साम्राज्य को इसकी पराकाष्ठा पर पहुँचाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दयिा। कलिंग युद्ध (kalinga war year in Hindi) के कारण हुए भारी रक्तपात से राजा अशोक बहुत आहत हुए और उन्होंने स्वयं को बौद्ध धर्म में परिवर्तित कर लिया।

    • राजगद्दी पर बैठने के पश्चात् अशोक द्वारा केवल एक युद्ध किया गया जो कलिंग युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
    • अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष (261 ई.पू.) में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया और जीत लिया।
    • उसके अपने कथन के अनुसार इस युद्ध में 1,00,000 लोग मारे गए और 1,50,000 बंदी बनाए गए। इस युद्ध में अत्यधिक संख्या में हुए नर-संहार से अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया।
    • कलिंग युद्ध एवं उसके परिणामों के विषय में अशोक के 13वें अभिलेख से विस्तृत सूचना प्राप्त होती है।
    • उसने दूसरे राज्यों पर भौतिक विजय पाने की नीति छोड़ कर सांस्कृतिक विजय पाने की नीति अपनाई। दूसरे शब्दों में, भेरी-घोष के बदले धम्म घोष की घोषणा की।
    • अशोक ने पश्चिम एशिया और यूनानी राज्यों में अपने शान्तिदूत भेजे तथा श्रीलंका और मध्य एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने धर्मप्रचारक भेजे।
    • अशोक ने अपनी विजय के पश्चात् कलिंग को अपने अधिकार में रखा और अपने साम्राज्य में मिला लिया।
    • अपने साम्राज्य के भीतर उसने एक तरह के अधिकारियों की नियुक्ति की, जो रज्जुक कहलाते थे। इन्हें प्रजा को केवल पुरस्कार ही नहीं, बल्कि दंड देने का भी अधिकार प्रदान किया गया था।
  • महासंग्राम दाशराज्ञ युद्

    महासंग्राम दाशराज्ञ युद्

    आप सभी जानते हैं कि आज से लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था। इस युद्ध की सभी चर्चा करते हैं क्योंकि इस पर एक ग्रंथ भी लिखा गया है और इस युद्ध के सूत्रधार थे भगवान कृष्ण, इसलिए यह युद्ध सभी को याद है। लेकिन महाभारत युद्ध के लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व एक और युद्ध हुआ था जिसे दशराज युद्ध (दाशराज्ञ के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है। यह रामायण काल की बात है। दाशराज युद्ध त्रेतायुग में लड़ा गया। महाभारत युद्ध के पहले भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच दाशराज्ञ युद्ध हुआ था। इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं। ऋग्वेद के सातवें मंडल में इस युद्ध का वर्णन मिलता है। इस युद्ध से यह पता चलता है कि आर्यों के कितने कुल या कबीले थे और उनकी सत्ता धरती पर कहां तक फैली थी।

    इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास हुआ था। भारतों के कबीले का राजा था सुदास जो अपने ही कुल के अन्य कबीले से लड़ा था। माना जाता है कि वह पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु, अलिन, पक्थ, भलान, शिव एवं विषाणिन कबीले के लोगों से लड़ा था। इस युद्ध में जहां एक ओर पुरु नामक आर्य समुदाय के योद्धा थे, तो दूसरी ओर ‘तृत्सु’ नामक समुदाय के योद्धा युद्ध लड़ रहे थे। दोनों ही हिन्द-आर्यों के ‘भरत‘ नामक समुदाय से संबंध रखते थे। हालांकि पुरुओं के नेतृत्व में से कुछ को आर्य नहीं माना जाता था।

    तुत्सु का नेतृत्व : तुत्सु समुदाय का नेतृत्व राजा सुदास ने किया। सुदास दिवोदास के पुत्र थे, जो स्वयं सृजय के पुत्र थे। सूंजय के पिता का नाम देवव्रत था। सुदास के युद्ध में सलाहकार ऋषि वशिष्ठ थे।

    पुरु का नेतृत्व : सुदास के विरुद्ध दस राजा युद्ध लड़ रहे थे जिनका नेतृत्व पुरु कबीला के राजा संवरण कर रहे थे। जिनके सैन्य सलाहकार ऋषि विश्वामित्र थे।

    राजा सुदास : सम्राट भरत के समय में राजा हस्ति हुए जिन्होंने अपनी राजधानी हस्तिनापुर बनाई। राजा हस्ति के पुत्र अजमीढ़ को पंचाल का राजा कहा गया है। राजा अजमीढ़ के वंशज राजा संवरण जब हस्तिनापुर के राजा थे तो पंचाल में उनके समकालीन राजा सुदास का शासन था। राजा सुदास का संवरण से युद्ध हुआ जिसे कुछ विद्वान ऋग्वेद में वर्णित ‘दाशराज्ञ युद्ध‘ से जानते हैं। राजा सुदास के समय पंचाल राज्य का विस्तार हुआ। राजा सुदास के बाद संवरण के पुत्र कुरु ने शक्ति बढ़ाकर पंचाल राज्य को अपने अधीन कर लिया तभी यह राज्य संयुक्त रूप से ‘कुरु-पंचाल’ कहलाया। परन्तु कुछ समय बाद ही पंचाल पुनः स्वतन्त्र हो गया। पुरोहिताई और जल बंटवारे का झगड़ा : उस काल की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना दसराज्ञ अथवा दस राजाओं का युद्ध है। इसमें उस काल के समुदाय या कबीलों का उल्लेख मिलता है। सुदास तृश्तु परिवार का एक ‘भरत’ राजा था। शुरू में विश्वामित्र सुदास का पुरोहित था पर बाद में सुदास ने विश्वामित्र को हटाकर वशिष्ठ को नियुक्त कर लिया था। बदला लेने की भावना से विश्वामित्र ने दस राजाओं के एक कबिलाई संघ का गठन किया। इसमें पांच महत्वपूर्ण कबीले थे- पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु और पांच अन्य छोटे कबीले थे। अलिन, पक्थ, भलान, शिव एवं विषाणिन थे। यह संघर्ष परुष्णी (रावी) नदी के किनारे हुआ जिसमें सुदास का भरत कबीला विजयी रहे। इस युद्ध का एक कारण परुष्णी नदी के जल का बंटवारा भी था।

    सुदास के विरुद्ध लड़े ये समुदाय : ऋग्वेद का सुविख्यात नायक सुदास भारतों का नेता था और पुरोहित वसिष्ठ उसके सहायक थे। इनके शत्रु थे, पांच प्रमुख जनजातियां- ‘अनु’, ‘द्रुह्यु’, ‘यदु’, ‘तुर्वशस्’ और ‘पुरु’ तथा पांच गौण जनजातियां- ‘अलिन’, ‘पक्थ’, ‘भलानस्’, ‘शिव’ और ‘विषाणिन’ के दस राजा। विरोधी गुट के सूत्रधार ऋषि विश्वामित्र थे और उसका नेतृत्व पुरुओं ने किया था। हालांकि इन दस राजाओं का सभी जगह अलग-अलग वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में दासराज युद्ध को एक दुर्भाग्यशाली घटना कहा गया है। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस युद्ध में सुदास के भारतों की विजय हुई और उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप के आर्यावर्त और आर्यों पर उनका अधिकार स्थापित हो गया। इसी कारण आगे चलकर पूरे देश का नाम ही आर्यावर्त की जगह ‘भारत‘ पड़ गया।

    संदर्भ 1-ऋग्वेद, महाभारत और पुराण। 2-डॉ. शिवस्वरूप सहाय, भारतीय पुरातत्व और प्रागैतिहासिक संस्कृतियां, 3- बृजेश के बर्मन, पुस्तक विश्वामित्र,

     

  • हर्ष और उसका काल खण्ड का विवरण

    हर्ष और उसका काल खण्ड का विवरण

    हर्ष वर्धन की जीवनी (उनका जीवन)

    हर्षवर्धन वर्धन साम्राज्य का सबसे महान शासक था। वह 606 ई. में सिंहासन पर बैठा। प्रभाकर वर्धन और यशोमती उनके माता-पिता थे। उनका एक बड़ा भाई था जिसका नाम राजवर्धन और एक छोटी बहन थी जिसका नाम राजश्री था। उन्हें “शिलादित्य” भी कहा जाता था। थानेश्वर उसकी राजधानी थी। यशोमती, उनकी मां, अपने पति की मृत्यु से दुखी होकर, 605 ईस्वी में सती हुई। मालवा के देवगुप्त ने राजश्री के पति गृहवर्मा को मार डाला और उसे कन्नौज में कैद कर लिया। राज्यवर्धन जो उसे छुड़ाने गए थे, गौड़ प्रदेश के शशांक ने उन्हें मार डाला था। ऐसी दर्दनाक परिस्थितियों में हर्षवर्धन सत्ता में आए। राजश्री की रिहाई और शशांक से बदला लेना उनका मुख्य उद्देश्य था।

    हर्षवर्धन का साम्राज्य

    641 ई. में हर्षवर्धन ने स्वयं को मगध का राजा कहा। उनकी ख्याति विदेशों में भी फैली। उसने चीन के साथ राजदूतों का आदान-प्रदान किया। गुप्तों के बाद उत्तर भारत को एक करने का श्रेय हर्षवर्धन को जाता है। उसका साम्राज्य पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल और उड़ीसा तक और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला हुआ था।

    हर्षवर्धन की उपलब्धियां

    राजश्री कैद से भाग कर विंध्य पर्वत की ओर अपनी जान देने के लिए निकल पड़ी। इस बात का पता चलने पर हर्षवर्धन ने बड़ी मुश्किल से उसकी तलाश की और उसे चिता में कूदने से रोका। फिर उसने कन्नौज को अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया और इसे अपनी दूसरी राजधानी बनाया। यद्यपि कन्नौज की जनता ने स्वयं हर्षवर्धन को कन्नौज की ग‌द्दी सँभालने के लिए आमंत्रित किया था। हर्षवर्धन ने कामरूप के भास्कर वर्मा की मदद से गौड़देश गौड़ साम्राज्य (बंगाल) के शशांक पर हमला किया और बदला लिया। लेकिन जब तक शशांक जीवित थे, वह उन्हें पूरी तरह से हरा नहीं सके। फिर उसने मालवा के देवगुप्त को हराकर उसे अपने राज्य में मिला लिया। 612 ईस्वी तक, उन्होंने पंजाब के पंच सिंधु पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया। कन्नौज, बिहार, उड़ीसा और अन्य स्थानों को उसके राज्य में जोड़ा गया। उसने वल्लभी के ध्रुवसेन द्वितीय को हराया। बाद में उन्होंने अपनी बेटी की शादी उनसे कर दी और उनके साथ अच्छे संबंध स्थापित कर लिए।  गौड़देश के शशांक की मृत्यु के बाद, हर्षवर्धन ने उड़ीसा, मगध, वोदरा, कोंगोंडा (गंजम), और बंगाल (गौड़ादेश) जीता। बाद में उन्होंने नेपाल के शासक को हराया और उनसे भेंट प्राप्त की। उसने उत्तर- भारतीय राज्यों को हराकर अपना वर्चस्व स्थापित किया। इन उपलब्धियों की स्मृति में उन्होंने “उत्तरपथेश्वर” की उपाधि धारण की।

    हर्षवर्धन की प्रशासन इकाई

    हर्ष के समय में शासन व्यवस्था का स्वरूप राजतन्त्रात्मक था। राजा अपनी दैवीय उत्पत्ति में विश्वास करता था। राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए ग्राम, विषय, भुक्ति तथा राष्ट्र में विभाजित था।

    हर्ष ने पदाधिकारियों को शासनपत्र (सनद) के द्वारा जमीन देने की प्रथा चलाई थी हर्ष कालीन ताम्रपत्रों में केवल तीन करों का उल्लेख मिलता है- भाग, हिरण्य तथा बलि।

      1. भाग कर भूमि कर था जो राज्य की आय का मुख्य साधन था तथा कृषकों से उनकी उपज का छठां भाग लिया जाता था।
      2. हिरण्य कर नकद लिया जाता था जिसे सम्भवतः व्यापारी देते थे।
      3. बलि कर के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। सम्भव है कि यह एक प्रकार का धार्मिक कर रहा होगा

    हर्ष की दो तांबे की मुद्राएँ नालंदा व सोनीपत से प्राप्त हुई हैं। सोनीपत की मुद्रा पर शिव के वाहन नंदी का चित्रण है। नालंदा की मुद्रा पर श्रीहर्ष नाम लिखा है और उसे माहेश्वर, सार्वभौम व महाराजाधिराज कहा गया है।

    ह्वेनसांग के द्वारा हर्षवर्धन का वर्णन

    • ह्वेनसांग के अनुसार, देश के कानून में अपराध के लिए कड़ी सजा का प्रावधान था।
    • ह्वेनसांग हर्ष की सेना को चतुरंगिणी कहता था।
    • ह्वेनसांग के अनुसार, हर्ष ने कश्मीर से गौतम बुद्ध का दांत लाकर कन्नौज के निकट एक संघाराम में स्थापित किया था। नेपाल में हर्ष-संवत् (606 ई.) के प्रचलन (अंशुवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों द्वारा) के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि, नेपाल पर हर्ष का अधिपत्य था।
    • चीनी यात्री ह्वेनसांग ईसा की सातवीं सदी में भारत आया और लगभग 15 वर्ष तक भारत में रहा।
    • ह्वेनसांग के अनुसार, हर्षवर्द्धन की सेना में 60 हजार हाथी तथा एक लाख घोड़े थे।
    • हर्ष सूर्य एवं शिव का उपासक था।
    • ह्वेनसांग के अनुसार, हर्ष ने स्वयं को राजपुत्र कहा तथा अपना उपनाम शिलादित्य रखा।
    • हर्ष को भारत का अन्तिम हिन्दू सम्राट कहा गया है। उसका राज्य कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण उत्तर भारत तक विस्तृत था।
    • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने बताया है कि, हर्ष की राजकीय आय चार भागों में विभाजित थी जिसमें से एक भाग राजा के व्यय के लिए व दूसरा भाग धार्मिक कार्यों के लिए रखा जाता था।
    • ह्वेनसांग के अनुसार, हर्ष ने कश्मीर से गौतम बुद्ध का दांत लाकर कन्नौज के निकट एक संघाराम में स्थापित किया था। नेपाल में हर्ष-संवत् (606 ई.) के प्रचलन (अंशुवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों द्वारा) के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि. नेपाल पर हर्ष का अधिपत्य था।
    • ह्वेनसांग के प्रभाव में आकर हर्ष बौद्ध धर्म का महान् समर्थक हो गया। उक्त चीनी विवरण से ज्ञात होता है कि, उस समय पाटलिपुत्र तथा वैशाली पतन की अवस्था में थे।

    पुलकेशिन द्वितीय के साथ युद्ध

    हर्षवर्धन ने दक्षिण में नर्मदा नदी के पार अपने साम्राज्य का विस्तार करने का प्रयास किया। नर्मदा का युद्ध 634 ई. में हर्षवर्धन और पुलकेशिन द्वितीय के बीच हुआ था। इस युद्ध में उसकी हार हुई थी। जीतने वाले पुलकेशिन ने “परमेस्वर” की उपाधि ली। ऐहोल अभिलेखों में कहा गया है कि हर्ष का हर्ष (आनंद) उसके युद्ध के हाथियों को युद्ध के मैदान में गिरते देख उड़ गया। ह्वेनसांग ने हर्ष की हार का भी उल्लेख किया है। नर्मदा नदी इन दोनों साम्राज्यों के बीच की सीमा बन गई।

    हर्षवर्धन और बौद्ध धर्म

    भगवान शिव के एक भक्त हर्षवर्धन ने बाद में बौद्ध धर्म ग्रहण किया। उसने साम्राज्य में पशु बलि को रोका और मांसाहारी भोजन के प्रचलन को प्रतिबंधित किया। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रमुख स्थानों में स्तूप बनवाए। बौद्ध धर्म के विरोधियों और चरित्रहीन लोगों को उनके द्वारा दंडित किया गया था। वह कश्मीर के राजा से बुद्ध के दांतों के अवशेष लाए और इसे अंदर रखकर कन्नौज में एक स्तूप बनाया।

    कन्नौज में धार्मिक परिषद 643 ईस्वी

    हर्षवर्धन ने कन्नौज में धार्मिक वाद-विवाद और ह्वेनसांग को सम्मानित करने के लिए एक विशाल बौद्ध संगीति का आयोजन किया। ह्वेन त्सांग ने इस परिषद की अध्यक्षता की। इस परिषद में बीस राजाओं, हजार वि‌द्वानों, तीन हजार से अधिक बौद्ध भिक्षुओं, तीन हजार ब्राह्मणों और जैनियों ने भाग लिया। सभागार में बुद्ध की एक स्वर्ण प्रतिमा, जो राजा जितनी ऊंची थी, स्थापित की गई थी। यह परिषद 23 दिनों तक चली। ह्वेन त्सांग ने इस परिषद में महायान के दर्शन की व्याख्या की।

    प्रयाग (इलाहाबाद) बौद्ध परिषद 643 ईस्वी

    हर्षवर्धन ने प्रयाग में महा मोक्ष परिषद के नाम से एक सम्मेलन का आयोजन किया जो पांच साल में एक बार आता है। ह्वेनसांग को इस परिषद में आमंत्रित किया गया था। परिषद 75 दिनों तक चली। उन्होंने सभी धर्मो के गरीब लोगों को दान दिया। इस परिषद में, शिव और सूर्य के साथ बुद्ध की मूर्ति का जुलूस निकाला गया।

    थानेश्वर के वर्धनों में हर्षवर्धन का उच्च स्थान है। वह प्राचीन भारत के प्राप्तकर्ताओं में से एक है। वह एक सक्षम प्रशासक, एक बहादुर सैनिक, साहित्य के संरक्षक और लोगों के कल्याण की देखभाल करने वाले थे। वे स्वयं विद्वान थे। उन्होंने संस्कृत में “रत्नावली”, “प्रियदर्शिका” और “नागानंद” नाटक लिखे। उन्होंने प्रसिद्ध कवि बाणभट्ट को संरक्षण दिया जिन्होंने हर्षवर्धन के बारे में “हर्षचरित” नामक एक अमूल्य रचना लिखी। विद्या के संरक्षक, उन्होंने नालंदा विश्ववि‌द्यालय को बहुत दान दिया।

    हर्षवर्धन वर्धन साम्राज्य का सबसे महान शासक था। वह 606 ई. में सिंहासन पर बैठा। प्रभाकर वर्धन और यशोमती उनके माता-पिता थे। उनका एक बड़ा भाई था जिसका नाम राजवर्धन और एक छोटी बहन थी जिसका नाम राजश्री था। उन्हें “शिलादित्य” भी कहा जाता था। थानेश्वर उसकी राजधानी थी।

    यशोमती, उनकी मां, अपने पति की मृत्यु से दुखी होकर, 605 ईस्वी में सती हुई। मालवा के देवगुप्त ने राजश्री के पति गृहवर्मा को मार डाला और उसे कन्नौज में कैद कर लिया। राज्यवर्धन जो उसे छुड़ाने गए थे, गौड़ प्रदेश के शशांक ने उन्हें मार डाला था। ऐसी दर्दनाक परिस्थितियों में हर्षवर्धन सत्ता में आए। राजश्री की रिहाई और शशांक से बदला लेना उनका मुख्य उ‌द्देश्य था।

     

     

  •  गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म की उत्पत्ति

     गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म की उत्पत्ति

    बौद्ध मत की स्थापना गौतम बुद्ध ने की थी। उनके मां-बाप ने उनका नाम सिद्वार्थ रखा था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्यगण के मुखिया थे तथा उनकी मां का नाम माया था जो कोलियागण की राजकुमारी थी। उनका जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी (आधुनिक रुमिन्दी) नामक स्थान पर हुआ था। यह जानकारी हमें अशोक के एक स्तम्भ लेख के द्वारा मिलती है। बुद्ध की वास्तविक जन्म तिथि वाद-विवाद का विषय है परन्तु अधिकतर विद्वानों द्वारा इसको लगभग 566 ई. पू. माना गया है।

    यद्यपि उनका जीवन शाही ठाठ-बाट में व्यतीत हो रहा था लेकिन यह गौतम के मस्तिष्क को आकर्षित करने में असफल रहा। पारम्परिक स्रोतों’ के अनुसार, एक बूढ़े आदमी, एक बीमार व्यक्ति, एक मृत शरीर तथा एक सन्यासी को देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ। मानव जीवन के दुखों ने गौतम पर गहरा प्रभाव डाला।

    मानवता को दुखों से मुक्त कराने की खोज में उन्होंने 29 वर्ष की आयु में अपने घर, पत्नी तथा बेटे का परित्याग कर दिया। गौतम ने सन्यासी की भांति घूम-घूमकर छः वर्ष व्यतीत किए। उन्होंने वैशाली के अलारा कालमा से ध्यान करने और उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त की। उनकी यह शिक्षा गौतम को अन्तिम मुक्ति के लिए राह न दिखा सकी, तो उन्होंने पांच ब्राह्मण सन्यासियों के साथ उनका भी परित्याग कर दिया।

    उन्होंने कठोर संयम को अपनाया और सत्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न कठोर यातनाएं सहन की। अन्ततः इसको त्याग करके वे उरुवेला (आधुनिक बोध गया के पास निरंजना नदी के किनारे) गये और एक पीपल के वृक्ष (बौद्ध वृक्ष) के नीचे ध्यान मग्न हो गये। अन्ततः अपनी समाधि के उनचासवें दिन उन्हें “सर्वोच्च ज्ञान” की प्राप्ति हुई। तब से उनको “बुध” (ज्ञानी पुरुष) या “तथागत” (वह जो सत्य को प्राप्त करे) कहा जाने लगा।

    यहां से प्रस्थान करके वे सारनाथ के मृगदाव वाराणसी के पास पहुंचे और वहां पर उन्होंने अपना धर्मोपदेश दिया जिसको “धर्मचक्र प्रवर्तन” (धर्म के चक्र को घुमाना) के नाम से जाना जाता है।

    अश्वजित, उपालि, मोगाललना, श्रेयपुत्र और आनन्द- ये बुद्र के पहले पांच शिष्य थे। बुद्ध ने बौद्ध संघ का सूत्रपात किया। उन्होंने अपने अधिकतर धर्मोपदेश श्रावस्ती में दिए। श्रावस्ती का धनीं व्यापारी अनथापिण्डिका बुद्ध का शिष्य हो गया और उसने बौद्ध मत के लिए उदार दानं दिया। जल्द ही उन्होंने अपने धर्म प्रवचन के प्रचार के लिये बहुत से स्थानों का भ्रमण करना शुरू कर दिया। वे सारनाथ, मथुरा, राजगिर गया और पाटलिपुत्र गये। बिम्बिसार, अजातशत्रु (मगध), प्रसेनजीत (कोसल) और उदायन (कौशाम्बी) के राजाओं ने उनके सिद्धान्तों को स्वीकार किया तथा वे सब बुद्ध के शिष्य हो गये। वे कपिलवस्तु भी गये और उन्होंने अपनी धाय माता व बेटे राहुल को भी अपने सम्प्रदाय में परिवर्तित कर लिया।

    मलल गुण की राजधानी कुसि नगर (उत्तर प्रदेश के जिले देवरिया में स्थित कसया) में 80 वर्ष की आयु में (486 ई. पू.) बुद्ध की मृत्यु हो गई। आइए अब बुद्ध की उन शिक्षाओं का विवेचन करें जिन्होंने उस समय के धार्मि[tie_index]बौद्ध धर्म के वास्तविक संस्थापक महात्मा बुद्ध[/tie_index]क विचारों को नवीन शिक्षा प्रदान की।

    बौद्ध धर्म के वास्तविक संस्थापक महात्मा बुद्ध

    जन्म 563 ई.पू.
    जन्मस्थल लुम्बिनी वन (कपिलवस्तु- वर्तमान रुम्मिनदेई, नेपाल)
    पिता शुद्धोधन (शाक्यों के राज्य कपिलवस्तु के शासक)
    माता महामाया देवी (कोलिय गणराज्य)
    बचपन का नाम सिद्धार्थ (गोत्र- गौतम)
    पालन पोषण विमाता प्रजापति गौतमी
    विवाह 16 वर्ष की अवस्था में (यशोधरा-कोलिय गणराज्य की राजकुमारी)
    पुत्र राहुल
    गृह त्याग की घटना महाभिनिष्क्रमण
    सारथि चन्ना
    घोड़ा कंथक
    ध्यान गुरु / प्रथम गुरु अलार कालाम
    ज्ञान प्राप्ति 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध कहलाए।
    ज्ञान प्राप्ति स्थल गया (बोधगया, बिहार) निरंजना नदी का तट (घटना सम्बोधि)
    वट / पीपल वृक्ष इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति
    प्रथम उपदेश स्थल-ऋषि पत्तन (सारनाथ)

    स्थान वाली पाँच ब्राह्मण (पंचवर्गीय) घटना धर्मचक्र प्रवर्तन

    शिष्य आनंद व उपालि
    धर्मप्रचार का स्थल शाक्य, काशी, मगध, अंग, मल्ल, वज्जि, कोशल राज्य।
    जीवन का अंत 483 ई.पू., आयु-80 वर्ष, दिन-वैशाख पूर्णिमा, स्थल-कुशीनगर (उत्तर प्रदेश), कसिया गाँव-महापरिनिर्वाण (मृत्यु के बाद)।

    बुद्ध के जीवन

    बुद्ध के जीवन की घटनाएँ स्थान
    जन्म लुम्बिनी
    प्रथम प्रवचन सारनाथ
    ज्ञानप्राप्ति बोधगया
    निधन कुशीनगर

    बुद्ध के जीवन की घटनाएँ एवं उनके प्रतीक

    गर्भ हाथी
    जन्म कमल
    यौवन साँड़
    गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण) घोड़ा
    ज्ञान प्राप्ति (सम्बोधि) बोधिवृक्ष (पीपल)
    समृद्धि शेर
    प्रथम प्रवचन (धर्म चक्र प्रवर्तन) चक्र
    निर्वाण पदचिन्ह
    मृत्यु (महापरिनिर्वाण) स्तूप

    बौद्ध धर्म के सिद्धांत

    • बौद्ध दर्शन क्षणिकवादी और अन्तः शुद्धिवादी है। इसके अनुसार सभी संस्कार व्ययधर्मा हैं। अतः अप्रमाद के साथ मोक्ष का सम्पादन करें।
    • बौद्ध दर्शन नितांत कर्मवादी है। यहाँ कर्म का आशय कायिक, वाचिक व मानसिक चेष्टाओं से है।
    • बौद्ध दर्शन अनीश्वरवादी है। बौद्ध धर्म का पुनर्जन्म में विश्वास है। बौद्ध धर्म में व्यक्ति, भौतिक और मानसिक तत्वों के पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) से निर्मित बताया गया है।
    • महात्मा बुद्ध के अनुसार, संसार दुःखमय है और लोग केवल काम (इच्छा लालसा) के कारण दुःख पाते हैं।
    • उनकी शिक्षा है कि, न अत्यधिक विलास करना चाहिए और न अत्यधिक संयम। वे मध्यम मार्ग के प्रतिस्थापक थे। बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए आचार-नियम (विनय) निर्धारित किए थे।
    • गौतम बुद्ध ने दुःख की निवृत्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग का उपाय बताया है।

    बुद्ध के उपदेश

    बुद्ध के मूलभूत उपदेश निम्नलिखित में संकलित हैं:

    1. चार पवित्र सत्य, और
    2. अष्टांगिक मार्ग

     निम्नलिखित चार पवित्र सत्य हैं:

    ⅰ) संसार दुःखों से परिपूर्ण है।

    ii) सारे दुःखों का कोई न कोई कारण है। इच्छा, अज्ञान और मोह मुख्यतः दुःख के कारण हैं।

    iii) इच्छाओं का अन्त मुक्ति का मार्ग है।

    iv) मुक्ति (दुःखों से छुटकारा पाना) अष्टांगिक मार्ग द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

    अष्टांगिक मार्ग में निम्नलिखित सिद्धान्त समाहित हैं:

    i) सम्यक् दृष्टिः इसका अर्थ है इच्छा के कारण ही इस संसार में दुःख व्याप्त हैं। इच्छा का परित्याग ही मुक्ति का मार्ग है।

    ii) सम्यक् संकल्पः यह लिप्सा और विलासिता से छुटकारा दिलाता है। इसका उद्देश्य मानवता को प्यार करना और दूसरों को प्रसन्न रखना है।

    iii) सम्यक् वाचन अर्थात् सदैव सच बोलना,

    iv) सम्यक् कर्मः इसका तात्पर्य है स्वार्थ रहित कार्य करना।

    v) सम्यक् जीविकाः अर्थात् आदमी को ईमानदारी से अर्जित साधनों द्वारा जीवन-यापन करना चाहिए।

    vi) सम्यक् प्रयासः इससे तात्पर्य है कि किसी को भी बुरे विचारों’ से छुटकारा पाने के लिए इन्द्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए। कोई भी मानसिक अभ्यास के द्वारा अपनी इच्छाओं एवं मोह को नष्ट कर सकता है।

    viii) सम्यक् समाधिः इसका अनुसरण करने से शान्ति प्राप्त होगी। ध्यान से ही वास्तविक सत्य प्राप्त किया जा सकता है।

    बौद्ध-संघ (संस्था के रूप में)

    संघ बौद्ध मत की धार्मिक व्यवस्था थी। यह अच्छी प्रकार से संगठित एवं शक्तिशाली संस्था थी और इसने बौद्ध मत को लोकप्रिय बनाया। 15 वर्ष से अधिक आयु वाले सभी नागरिकों के लिए इसकी सदस्यता खुली थी चाहे वे किसी भी जाति के हों। अपराधी, कुष्ठ रोगी तथा संक्रामक रोग से पीड़ित लोगों को संघ की सदस्यता नहीं दी जाती थी। प्रारम्भ में गौतम बुद्ध महिलाओं को संघ का सदस्य बनाने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन उनके मुख्य शिष्य आनन्द एवं उनकी घाय मां महाप्रजापति गौतमी के लगातार निवेदन करने पर उन्होंने उनको संघ में प्रवेश दिया।

    भिक्षुओं को प्रवेश लेने पर विधिपूर्वक अपना मुंडन कराना एवं पीले या गेरूए रंग का लिबास पहनना पड़ता था। भिक्षुओं से आशा की जाती थी कि वे नित्य बौद्ध मत के प्रचार के लिए जायेंगे और भिक्षा प्राप्त करेंगे। वर्षा ऋतु के चार महीनों में वे एक निश्चित बिस्तर लगाने तथा समाधि करते थे। इसको आश्रय या “वशा” कहा जाता था। संघ लोगों को शिक्षा देने का भी काम करता था। ब्राह्मणवाद के विपरीत बौद्ध मत में समाज के सभी लोग शिक्षा ग्रहण कर ‘सकते थे। स्वाभाविक रूप से जिन लोगों को ब्राह्मणों ने शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित कर दिया था उनको बौद्ध मत में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो गया और इस प्रकार शिक्षा समाज के काफी तबकों में फैल गई।

    संघ का संचालन जनतांत्रिक सिद्धान्तों’ के अनुसार होता था और अपने सदस्यों को अनुशासित करने की शक्ति भी इसी में निहित थी। यहां पर भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के लिए एक आचार- संहिता थी और वे इसका पालन करते थे। गलती करने वाले सदस्य को संघ दंडित कर सकता था।

    बौद्ध मत की सभायें

    अनुश्रुतियों के अनुसार बुद्ध की मृत्यु के थोड़े समय बाद 483 ई. पू. में राजगृह के पास सप्तपर्णि गुफा में बौद्ध मत की प्रथम सभा हुई। इस सभा की अध्यक्षता महाकस्यप ने की। बुद्ध की शिक्षा को पिटको’ में विभाजित किया गया, जिनके नाम इस प्रकार हैं:

    क) विनय-पिटक, और

    ख) सुत्त-पिटक।

    विनय-पिटक की रचना उपाली के नेतृत्व में की गई और सुत्त-पिटक की रचना आनन्द के नेतृत्व में की गई।

    दूसरी सभा का आयोजन 483 ई. पू. में वैशाली में हुआ। पाटलिपुत्र तथा वैशाली के मिक्षुओं ने कुछ नियमों का निर्धारण किया परन्तु इन नियमों को कौशाम्बी व अवन्ति के भिक्षुओं के द्वारा बुद्ध की शिक्षा के प्रतिकूल घोषित कर दिया गया। दोनों विरोधी गुटों के बीच कोई भी समझौता कराने में सभा असफल रही। बौद्ध धर्म का विभाजन स्थायी तौर पर दो बौद्ध सम्प्रदायों-स्थविरवादी व महासांधिक में हो गया। पहले सम्प्रदाय ने विनय-पिटक में वर्णित रूढ़िवादी विचारों को अपनाया और दूसरे ने नये नियमों का समर्थन किया और फिर उनमें परिवर्तन किए।

    तीसरी सभा का आयोजन अशोक के शासनकाल में मोग्गालिपुत्तत्स्सि की अध्यक्षता में पाटलिपुत्र में किया गया। इस सभा में सिद्वान्तों की दार्शनिक विवेचना को संकलित किया गया तथा इसको अभिधम्म-पिटक के नाम से जाना जाता है। इस सभा में बौद्धमत को असंतुष्टों एवं नये परिवर्तनों से मुक्त कराने का प्रयास किया गया। 60,000 “पथभ्रष्ट” भिक्षुओं को बौद्ध मत से इस सभा द्वारा निष्कासित कर दिया गया। सप्त उपदेशों के साहित्य को परिभाषित किया गया तथा आधिकारिक तौर पर विघ्न पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से भी निबटा गया।

    चौथी सभा का आयोजन काश्मीर में कनिष्क के शासन काल में हुआ। इस सभा में उत्तरी भारत के हीनयान सम्प्रदाय को मानने वाले एकत्रित हुए। तीन पिटकों पर तीन टीकाओं’ (भाष्यों) का संकलन इस सभा द्वारा किया गया। इसने उन विवादग्रस्त मतभेद वाले प्रश्नों’ का निबटारा किया जो श्रावस्तीवासियों एवं काश्मीर तथा गन्धार के प्रचारकों’ के मध्य उत्पन्न हो गये थे।.

    बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय

    वैशाली में आयोजित दूसरी सभा में बौद्ध धर्म का निम्न दो सम्प्रदायों में विभाजन हुआ:

    क) स्थविरवादी

    ख) महासांधिक

    स्थविरवादी धीरे-धीरे ग्यारह सम्प्रदायों और महासांधिक सात सम्प्रदायों में बंट गए। ये अठारह सम्प्रदाय “हीनयान” मत में संगठित हुए।

    • स्थविरवादी कठोर भिक्षुक जीवन और मूल निर्देशित कड़े अनुशासित नियमों का अनुसरण करते थे।

    • वह समूह जिसने संशोधित नियमों को माना, वह महासांधिक कहलाया।

    महायान सम्प्रदाय का विकास चौथी बौद्ध सभा के बाद हुआ। हीनयान सम्प्रदाय जो बुद्ध की रूढ़िवादी शिक्षा में विश्वास करता था, का जिस गुट ने विरोध किया और जिन्होंने नये विचारों को स्वीकार किया, वे लोग महायान सम्प्रदाय के समर्थक कहलाये। उन्होंने बुद्ध की प्रतिमा बनायी और ईश्वर की भांति उसकी पूजा की। प्रथम सदी ई. कनिष्क के शासन काल में कुछ सैद्धांतिक परिवर्तन किए गए।

    बौद्ध धर्म के पतन के कारण

    ईसा की बारहवीं सदी तक आते-आते बौद्ध धर्म भारत से लुप्त हो गया। इसमें भी ब्राह्मण-धर्म की वे सभी बुराइयाँ आ गई, जिनके विरुद्ध इसने आरम्भ में लड़ाई छेड़ी थी। बौद्ध धर्म की चुनौती का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सुधारा। उन्होंने गोधन की रक्षा पर बल दिया तथा स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी धर्म का मार्ग प्रशस्त किया। कालांतर में बौद्ध धर्म में विकृतियाँ आती गई। बाद में उन्होंने जनसामान्य की भाषा पाली को छोड़ दिया और संस्कृत को ग्रहण कर लिया, जो केवल विद्वानों की भाषा थी। ईसा की पहली सदी से वे बड़ी मात्रा में प्रतिमा-पूजन करने लगे और उपासकों से अत्यधिक चढ़ावा लेने लगे। बौद्ध विहारों को राजाओं से भी संपत्ति के दान मिलने लगे। इन सभी से बौद्ध भिक्षुओं का जीवन विलासिता पूर्ण बन गया। विहारों में अपार संपत्ति और स्त्रियों के प्रवेश होने से उनकी स्थिति और भी बिगड़ी। बौद्ध भिक्षु नारी को भोग की वस्तु समझने लगे। एक समय बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा था, यदि विहारों में स्त्रियों का प्रवेश न हुआ होता तो यह धर्म हजार वर्ष रहता, लेकिन जब स्त्रियों को प्रवेशाधिकार दे दिया गया है, तब यह धर्म केवल पाँच सौ वर्ष रहेगा। ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को प्रताड़ित किया। शैव संप्रदाय के हूण राजा मिहिरकुल ने सैकड़ों बौद्धों को मौत के घाट उतार दिया। गौड़ देश के शिवभक्त शशांक ने बोधगया में उस बोधिवृक्ष को काट डाला, जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।

    बौद्ध धर्म से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न

    01. बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु कहां बिताई थी?

    a) श्रावस्ती में                                    b) वैशाली में
    c) कुशीनगर में                                  d) सारनाथ में

    02. गौतम बुद्ध की मां किस वंश से संबंधित थी?

    a) शाक्य वंश                                     b) माया वंश
    c) लिच्छवी वंश                                 d) कोलिया वंश

    03. बुद्ध के जीवन की किस घटना को महाभिनिष्क्रमणके रूप में जाना जाता है?

    a) उनका महापरिनिर्वाण                 b) उनका जन्म

    c) उनका गृहत्याग                            d) उनका प्रबोधन

    04. आलार कलाम कौन थे?

    a) बुद्ध के एक शिष्य

    b) एक प्रतिष्ठित बौद्ध भिक्षु

    c) बुद्धकालीन एक शासक

    d) बुद्ध के एक गुरु

    05. महात्मा बुद्ध ने अपना पहला धर्मचक्रप्रवर्तन किस स्थान पर दिया था?

    a) लुंबिनी में                                      b) सारनाथ में

    c) पाटलिपुत्र में                                 d) वैशाली में

    06. निम्नलिखित में से कौन बुद्ध के जीवन काल में ही संघ प्रमुख होना चाहता था?

    a) देवदत्त                                             b) महाकस्सप

    c) रूपाली                                            d) आनंद

     07. निम्न में से किस बौद्ध साहित्य में महात्मा बुद्ध के नैतिक एवं सिद्धांत संबंधी प्रवचन संकलित है?

    a) विनय पिटक                               b) जातक कथाएं

    c) अभिधम्म पिटक                          d) सुत्त पिटक

     08. बोधगया में महाबोधि मंदिर बनाया गया जहां-

    a) गौतम बुद्ध पैदा हुए थे

    b) गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ

    c) गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन दिया

    d) गौतम बुद्ध की मृत्यु हुई

     09. भारतीय कला में बुद्ध के जीवन की किस घटना का चित्रण मृग सहित चक्रद्वारा हुआ है?

    a) महाभिनिष्क्रमण            b) संबोधि

    c) प्रथम उपदेश                                 d) निर्वाण

    10. गांधार शैली की मूर्ति कला में बुद्ध के सारनाथ में हुए प्रथम धर्मोपदेश से संबद्ध प्रवचन मुद्रा का नाम है?

    a) अभय                                              b) ध्यान

    c) धर्मचक्र                                          d) भूमिस्पर्श

     11. बुध की खड़ी प्रतिमा निम्न में से किस काल में बनाई गई ?

    a) गुप्त काल                                     b) कुषाण काल

    c) मौर्य काल                                    d) गुप्तोत्तर काल

    12. महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर को और किस अन्य नाम से जानते हैं?

    a) वज्रपाणि                                        b) मंजूश्री

    c) पद्मपाणि                                     d) मैत्रेय

    13. बोधिसत्व पद्मपाणि का चित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रायः चित्रित चित्रकारी है, जो-

    a) अजंता में है                                  b) बदामी में है

    c) बाघ में है                                     d) एलोरा में है

    14. अजंता की गुफाएं निम्नलिखित में से किससे संबंधित है?

    a) रामायण                                         b) महाभारत

    c) जातक कथाएं                              d) पंचतंत्र कहानियां

    15. बराबर पहाड़ी की गुफाओं के विषय में निम्न में से कौन एक सही नहीं है?

    a) बराबर पहाड़ी पर कुल 4 गुफाएं हैं।

    b) 3 गुफाओं की दीवार पर अशोक के अभिलेख उत्कीर्ण हैं।

    c) ये अभिलेख इन गुफाओं को आजीवकों को समर्पित होने का उल्लेख करते हैं।

    d) ये अभिलेख ईसा पूर्व छठी शताब्दी के हैं।

     16. निम्नलिखित में से किसे सर्वश्रेष्ठ स्तूप मानते हैं-

    a) अमरावती                                      b) भरहुत

    c) सांची                                               d) सारनाथ

    17. कश्मीर में कनिष्क के शासनकाल में जो बौद्ध संगीति आयोजित हुई थी उसकी अध्यक्षता निम्नलिखित में से किसने की थी ?

    a) पार्श्व                                               b) नागार्जुन

    c) शुद्रक                                             d) वसुमित्र

    18. बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश कहां दिये थे?

    a) वैशाली में                                      b) श्रावस्ती में

    c) कौशांबी में                                     d) राजगृह में

    19. बुद्ध के जीवन की किस घटना को महाभिनिष्क्रमण के रूप में जाना जाता है?

    a) उनका महापरिनिर्वाण                 b) उनका जन्म

    c) उनका गृह त्याग                         d) उनका प्रबोधन

    20. बुद्ध का जन्म कहां हुआ था?

    a) वैशाली                                            b) लुंबिनी

    c) कपिलवस्तु                                   d) पाटलिपुत्र

     21. महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण कहां हुआ?

    a) तुंबिनी में                                      b) बोधगया में

    c) कुशीनगर में                                d) कपिलवस्तु में

    ANSWER

    1. B 2. D 3. C 4. D
    5. B 6. A 7. D 8. B
    9. C 10. C 11. B 12. C
    13. A 14. C 15. D 16. C
    17. D 18. B 19. C 20. B

     

  • हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा संस्कृति का कालानुक्रम

    5500 ई. पू. से 3500 ई. पू. तक नवपाषाण युग

    बलूचिस्तान और सिंधु के मैदानी भागों में स्थिति मेहरगढ़ और फीली गुलमुहम्मद जैसी बस्तियां उभरीं। यहां लोग पशु चराने के साथ-साथ थोड़ा बहुत खेती का काम भी करते थे। इस प्रकार स्थायी गांवों का उद्भव हुआ। इस युग के लोग गेहूं, जौं, खजूर, तथा कपास की खेती की जानकारी रखते थे और भेड़ बकरियों और मवेशियों को पालते थे। साक्ष्य के रूप में मिट्टी के मकान, मिट्टी के बर्तन, और दस्तकारी की वस्तुएं मिली हैं।

    3500 ई. पू. से 2600 ई. पू. तक आरम्भिक हड़प्पा काल

    इस काल में पहाड़ों और मैदानों में बहुत सी बस्तियां स्थापित हुईं। इसी समय गांव सबसे अधिक संख्या में आबाद हुए। तांबा, चाक और हल का प्रयोग कर कई प्रकार के मिट्टी के अद्भुत बर्तन बनाए जाते थे जिससे कई क्षेत्रीय परम्पराओं के आरम्भ का पता चलता है। अन्न भंडार, ऊँची-ऊँची दीवारें और सुदूर व्यापार के प्रमाण मिले हैं। सारी सिंधु घाटी में मिट्टी के बर्तनों की एकरूपता के प्रमाण मिलते हैं। इसके साथ-साथ पीपल, कुबड़े बैलों, शेषनागों, सींगदार देवता आदि के रूपांकनों के प्रयोग के प्रमाण मिले हैं।

    2600 ई. पू. से 1800 ई. पू. तक पूर्ण विकसित हड़प्पा युग

    बड़े शहरों का अभ्युदय, समान आकार की ईंटें, तौलने के बाट, मुहरें, और मिट्टी के बर्तन, नियोजित ढंग से बसे हुए शहर और दूर-दूर स्थानों के साथ व्यापार।

    1800 ई. पू. से आगे… उत्तर-हड़प्पा युग

    हड़प्पा की सभ्यता के बहुत से शहर खाली हो गए, अंतर-क्षेत्रीय विनिमय में ह्रास हुआ, लेखन कार्य और शहरी जीवन का त्याग कर दिया गया। हड़प्पा की सभ्यता के शिल्प और मिट्टी के बर्तनों की परम्परा जारी रही। पंजाब सतलुज यमुना की ग्रामीण संस्कृतियों का विभाजन और गुजरात में हड़प्पा की शिल्प और मिट्टी के बर्तनों की परंपराओं का अपनाया जाना।

  • निम्न पुरा पाषाण काल (Lower Paleolithic Period)

    मानव द्वारा प्रचीनतम उपकरण हमें इस काल में प्राप्त होते हैं, जब मानव ने सर्वप्रथम पम्थर का स्वयं फलकीकरण कर अपनी आवश्यकतानुसार औजार बनाए। प्राचीनतम औजार वे है जिनमें पैबुल (Pebble) के एकतरफ फलक उतार कर चापर औजार बनाए गए। ये प्राचीन उपकरण हमें सर्वप्रथम मोरोक्को तथा मध्य अफ्रीका में ओल्डुवई गर्ज के सबसे प्रथम तह से प्राप्त होते हैं। प्रथम स्थान पर इनके साथ विल्लफ्रेन्चिय (Villefranchian) प्रकार के पशुओं की हड्डियाँ भी मिलती है, जो अभिनूतनकाल (Pleistocene) से पहले काल के जानवर थे जो अभी भी बचे रह गये थे। इनमें बड़े-बड़े दातों वाले हाथी (Tusks), बड़े-बड़े नुकीले दांतों वाले चीते, लकड़बग्घा इत्यादि शामिल थे। इस काल में मानव भोजन के लिए शिकार करता था। मानव ने मध्य और अभिनूतन काल में वापर और चापिंग औजारों का निर्माण किया, इसमें चॉपर में एक तरफ से फलकीकरण करके औजार बनाए गए। इन्हीं औजारों के बाद में प्रागे हस्त कुठारों का निर्माण किया गया और कालान्तर में इन्हीं से सुन्दर हस्त कुल्हाडियां निर्मित हुई।

    अभिनूतनकाल (Pleistocene) काल में पृथ्वी पर कुछ ऐसे परिवर्तन हुए जिनके कारण मानव का जन्त हुआ मानव के प्राचीनतम अवशेष हमें अफ्रीका में ओल्डुवई गर्त (Olduvaj Garge) तन्जानिया, कीनिया की झील रूडोल्फ (Lake Rudolf) इत्यादि में प्राप्त हुए इसके अतिरिक्त बीजिंग (चीन) में झाऊ काऊ तेन (Zhou-kaou Ten) तथा जावा में भी प्राचीनतम मानव के अवशेष प्राप्त हुए। भारत में हाल ही तक पाषाण कालीन मानव के अवशेष प्राप्त नहीं हुए थे परन्तु 1982 में मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी में हथनोरा (Hathnora) से तथा इसी क्षेत्र में 1997 में निम्न पुरा पाषाण कालीन मानव (Homo-eractus) के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

    भारतीय उपमहाद्वीप में सिन्ध तथा केरल को छोड़ सभी स्थानों से निम्न पुरापाषण कालीन अवशेष प्राप्त होते हैं जो कि नदी के किनारों (Terraces) कन्दराओं (Caves), rock shelters तथा खुले स्थलों से भी प्राप्त हुए है। पत्थर के इन उपकरणों के साथ पशु तथा

  • पुरापाषाण काल (Paleaolithic Period)

    प्रागैतिहासिक काल की संस्कृतियों के बारे में जानकारी सर्वप्रथम युग में देखने पाषाण युग में देखने को मिलती है। लुब्बाक ने सर्वप्रथम पाषाण युग के भिन्न-भिन्न कालों को विभाजित किया, इनके अनुसार प्रथम पुरापाषाणकाल (Palaeolithic Age) तथा तथा द्वितीय नवपाषाण (Neolithic Age) था। इन्होंने यह विभाजन पाषाण उपकरणों के प्रकार तथा तकनीकी विशेषताओं आधार पर किया। 1970 में लारटेट ने पुरापाषाण काल को तीन भागों में विभाजित किया। (1) पूर्व पुरापाषाणकाल (2) मध्यपाषाण काल (3) उत्तर पाषाण काल। इन्होंने यह विभाजन उपकरणों की विधि में परिवर्तन तथा उस काल की जलवायु में आए परिवर्तनों कि आधार पर किया। 1961 में कॉमसन तथा ब्रैडवुड ने नवपाषाण काल तक के काल को तीन भागों में बाँटा। प्रथम काल भोजन संग्रहण तथा द्वितीय मध्य पाषाण काल को उन्होंने भोजन इक्ट्ठा करने वाला तथा तीसरे नवपाषाण काल को उन्होंने भोजन उत्पादन का काल कहा है। दूसरे शब्दों में पुरापाषाण काल शिकारी अवस्था, मध्यपाषाण काल को शिकारी एवम् भोजन संग्रहित करने वाला तथा नवपाषाण काल का भोजन उत्पादित का काल कहा गया है। परन्तु प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के कालनिर्धारण एवम् नामकरण में लारटेट का वर्गीकरण सर्वाधिक मान्य है।

    प्रागैतिहासिक मानव का इतिहास जानने का स्त्रोत मात्र उस काल के मानव द्वारा बनाए पाषाण के औजार है, जो मानव ने स्वयं अपनी आवश्यकतानुसार बनाए थे। लिखित साक्ष्यों के अभाव में मात्र यही स्त्रोत है जो काल के मानव के तकनीकी विकास को दर्शाता है। आज से करीब पाँच लाख वर्ष पूर्व मध्य प्लीस्टोसीन काल से हमें यह मिलने शुरू होते है। जिन्हें पुरापाषाण कहा जाता है। कुछ विद्वान इनसे पूर्व भी मानव को किसी प्रकार के स्वयं बनाए या प्राकृतिक रूप से निर्मित, हथियारों का प्रयोग करते बताया है, जिन्हें इयोलिथ कहते है। 1867 में दक्षिणी ओरलियन से उपकरण प्राप्त हुए। 1877 में इस प्रकार के औजार फ्रांस से भी प्राप्त हुए, लेकिन आजकल के विद्वान इन एक तरफ फलक उत्तरे (One sided flaking) हथियारों को प्राकृतिक तौर से उतरे फलक मानते है, जिन्हें इस काल के मानव ने उपयोग किया होगा इसके अतिरिक्त इन उपकरणों से मानव को स्वयं औजार बनाने का संकेत भी मिला होगा। मानव ने अपनी आवश्यकता के अनुरूप औजार बनाने की प्रक्रिया सभंवत लकड़ी तथा अन्य कार्बनयुक्त पदार्थ के औजार बनाने से शुरू की जो आज उपलब्ध नहीं है। परन्तु जब उसने पाषाण उपकरण बनाने शुरू किए तब से हमें पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध होने लगे। ये उपकरण मानव ने अपनी जरूरतों के अनुसार तथा उनके कार्य के अनुरूप निर्मित किए थे। जैसे मांस काटने तथा छीलने के लिए चॉपर (Chopper) तथा खुरचनी (Scrapers) का निर्माण किया पुरापाषाण काल को तीन अवस्थाओं में विभाजित किया गया है :-

    • आरंभिक पुरापाषाण कालीन औजार उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में बेलन नदी घाटी में पाए गए हैं।
    • मध्य प्रदेश के भोपाल के पास भीमबेटका की गुफाओं और शैलाश्रयों (चट्टानों से बने आश्रयों) में औजार मिले हैं, जो लगभग 1,00,000 ईसा पूर्व के हैं।
    • मध्य नर्मदा घाटी के हथनौरा (होशंगाबाद) से एक मानव की खोपड़ी मिली (भारत का एकमात्र मानव जीवाश्म) है।