आप सभी जानते हैं कि आज से लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था। इस युद्ध की सभी चर्चा करते हैं क्योंकि इस पर एक ग्रंथ भी लिखा गया है और इस युद्ध के सूत्रधार थे भगवान कृष्ण, इसलिए यह युद्ध सभी को याद है। लेकिन महाभारत युद्ध के लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व एक और युद्ध हुआ था जिसे दशराज युद्ध (दाशराज्ञ के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है। यह रामायण काल की बात है। दाशराज युद्ध त्रेतायुग में लड़ा गया। महाभारत युद्ध के पहले भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच दाशराज्ञ युद्ध हुआ था। इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं। ऋग्वेद के सातवें मंडल में इस युद्ध का वर्णन मिलता है। इस युद्ध से यह पता चलता है कि आर्यों के कितने कुल या कबीले थे और उनकी सत्ता धरती पर कहां तक फैली थी।
इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास हुआ था। भारतों के कबीले का राजा था सुदास जो अपने ही कुल के अन्य कबीले से लड़ा था। माना जाता है कि वह पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु, अलिन, पक्थ, भलान, शिव एवं विषाणिन कबीले के लोगों से लड़ा था। इस युद्ध में जहां एक ओर पुरु नामक आर्य समुदाय के योद्धा थे, तो दूसरी ओर ‘तृत्सु’ नामक समुदाय के योद्धा युद्ध लड़ रहे थे। दोनों ही हिन्द-आर्यों के ‘भरत‘ नामक समुदाय से संबंध रखते थे। हालांकि पुरुओं के नेतृत्व में से कुछ को आर्य नहीं माना जाता था।
तुत्सु का नेतृत्व : तुत्सु समुदाय का नेतृत्व राजा सुदास ने किया। सुदास दिवोदास के पुत्र थे, जो स्वयं सृजय के पुत्र थे। सूंजय के पिता का नाम देवव्रत था। सुदास के युद्ध में सलाहकार ऋषि वशिष्ठ थे।
पुरु का नेतृत्व : सुदास के विरुद्ध दस राजा युद्ध लड़ रहे थे जिनका नेतृत्व पुरु कबीला के राजा संवरण कर रहे थे। जिनके सैन्य सलाहकार ऋषि विश्वामित्र थे।
राजा सुदास : सम्राट भरत के समय में राजा हस्ति हुए जिन्होंने अपनी राजधानी हस्तिनापुर बनाई। राजा हस्ति के पुत्र अजमीढ़ को पंचाल का राजा कहा गया है। राजा अजमीढ़ के वंशज राजा संवरण जब हस्तिनापुर के राजा थे तो पंचाल में उनके समकालीन राजा सुदास का शासन था। राजा सुदास का संवरण से युद्ध हुआ जिसे कुछ विद्वान ऋग्वेद में वर्णित ‘दाशराज्ञ युद्ध‘ से जानते हैं। राजा सुदास के समय पंचाल राज्य का विस्तार हुआ। राजा सुदास के बाद संवरण के पुत्र कुरु ने शक्ति बढ़ाकर पंचाल राज्य को अपने अधीन कर लिया तभी यह राज्य संयुक्त रूप से ‘कुरु-पंचाल’ कहलाया। परन्तु कुछ समय बाद ही पंचाल पुनः स्वतन्त्र हो गया। पुरोहिताई और जल बंटवारे का झगड़ा : उस काल की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना दसराज्ञ अथवा दस राजाओं का युद्ध है। इसमें उस काल के समुदाय या कबीलों का उल्लेख मिलता है। सुदास तृश्तु परिवार का एक ‘भरत’ राजा था। शुरू में विश्वामित्र सुदास का पुरोहित था पर बाद में सुदास ने विश्वामित्र को हटाकर वशिष्ठ को नियुक्त कर लिया था। बदला लेने की भावना से विश्वामित्र ने दस राजाओं के एक कबिलाई संघ का गठन किया। इसमें पांच महत्वपूर्ण कबीले थे- पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु और पांच अन्य छोटे कबीले थे। अलिन, पक्थ, भलान, शिव एवं विषाणिन थे। यह संघर्ष परुष्णी (रावी) नदी के किनारे हुआ जिसमें सुदास का भरत कबीला विजयी रहे। इस युद्ध का एक कारण परुष्णी नदी के जल का बंटवारा भी था।
सुदास के विरुद्ध लड़े ये समुदाय : ऋग्वेद का सुविख्यात नायक सुदास भारतों का नेता था और पुरोहित वसिष्ठ उसके सहायक थे। इनके शत्रु थे, पांच प्रमुख जनजातियां- ‘अनु’, ‘द्रुह्यु’, ‘यदु’, ‘तुर्वशस्’ और ‘पुरु’ तथा पांच गौण जनजातियां- ‘अलिन’, ‘पक्थ’, ‘भलानस्’, ‘शिव’ और ‘विषाणिन’ के दस राजा। विरोधी गुट के सूत्रधार ऋषि विश्वामित्र थे और उसका नेतृत्व पुरुओं ने किया था। हालांकि इन दस राजाओं का सभी जगह अलग-अलग वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में दासराज युद्ध को एक दुर्भाग्यशाली घटना कहा गया है। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस युद्ध में सुदास के भारतों की विजय हुई और उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप के आर्यावर्त और आर्यों पर उनका अधिकार स्थापित हो गया। इसी कारण आगे चलकर पूरे देश का नाम ही आर्यावर्त की जगह ‘भारत‘ पड़ गया।
संदर्भ 1-ऋग्वेद, महाभारत और पुराण। 2-डॉ. शिवस्वरूप सहाय, भारतीय पुरातत्व और प्रागैतिहासिक संस्कृतियां, 3- बृजेश के बर्मन, पुस्तक विश्वामित्र,